
यह सवाल जब भी मेरे सामने आता है कि मैं बोध साहित्य को कितने लोगों तक पहुंच पाई या कितने लोगों की जिंदगी बेहतर कर पाई। मैं असमंजस में पड़ जाती हूं क्योंकि जितना मैं देख पा रही हूं बुक स्टॉल पर भी खड़ी होती हूं। तो उनमें से जिज्ञासु हकीकत में बहुत कम है, लेकिन फिर यह समझ में आता है कि आचार्य जी ने भी इसी तरह हर एक व्यक्ति से बात की, लाखों लोगों से बात करने के बाद शायद कुछ जिज्ञासु मिले होंगे। मैं बच्चों के हमेशा ज्यादा संपर्क में रही हूं तो उनकी मानसिकता मैं थोड़ी बहुत समझती हूं तो कई बार बात शायद जिज्ञासु होने की भी नहीं है। जो दुखी है उसके लिए अध्यात्म है इतना ही मुझे समझ में आया था और इसकी वजह से ही मैं यहां हूं। मैं यह तो नहीं कहूंगी कि मैं पूरी तरीके से लगी हुई हूं, लोगों तक बात पहुंचाने में। लेकिन हां जब भी किसी से मिलना होता है जब भी किसी से बात होती है जब भी मैं बाहर जाती हूं तो कोशिश करती हूं ज्यादा से ज्यादा लोगों से बात कर सकू। उन्हें किस तरह से मैं बोध साहित्य से जोड़ सकती हूं यह समझ सकूं। फिर यह चीज समझ में आती है कि मेरी खुद की जिंदगी कितनी बेहतर हुई है अगर वह बेहतर हुई है तो वह सहजता मेरे अंदर से आनी चाहिए। इसलिए लोगों से बात करना उनके लिए जरूरी है या नहीं यह तो नहीं पता और वह कितना आपकी बात से सहमत होंगे और आपसे जुड़ेंगे यह भी नहीं पता। लेकिन आपकी अपनी तरक्की के लिए आपकी खुद की यात्रा में आगे बढ़ने के लिए यह बहुत जरूरी है।



















