Poonamयह सवाल जब भी मेरे सामने आता है कि मैं बोध साहित्य को कितने लोगों तक पहुंच पाई या कितने लोगों की जिंदगी बेहतर कर पाई। मैं असमंजस में पड…
पूनम जी, बुक स्टॉल पर खड़े होकर जो हिसाब आप लगा रही हैं, उसमें एक बात ध्यान देने लायक है। आपने जिज्ञासुओं को गिना है, और कम पाया है। लेकिन वही जगह, वही मेहनत, उन बच्चों तक भी पहुंच रही है जिनकी मानसिकता आप समझती हैं, जो दुखी हैं, जिनके लिए अध्यात्म की जरूरत जिज्ञासा से पहले आती है। आपका हिसाब सिर्फ उन्हें गिन नहीं रहा जो तुरंत पूछते हैं, बाकी को खाली मान ले रहा है, जबकि आप खुद कह रही हैं कि आपकी अपनी शुरुआत भी जिज्ञासा से नहीं, दुख से हुई थी। जो काम पहले से हो रहा है, मिलने पर, बात करने पर, जुड़ने की कोशिश में, वह जिम्मेदारी निभाने का वही रूप है जिसकी बात पोस्ट कर रही है, सिर्फ नतीजे गिनने के तरीके ने उसे छोटा दिखा दिया। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















