
अपनी छवि, कहानी को। आचार्य जी को सुनने से पहले मैं हर नये काम को कोशिश करने से डरती थी सोचती थी नहीं कर पायी तो मजाक बन जायेगा जो छवि बनी है वो भी चली जाएगी किसी को जवाब नहीं दे पाती थी इसलिए की जो अच्छी होने की सभी के नजर मे मेरी छवि है वो खराब हो जाएगी।



















