
वो लड़की जो कभी सिकुड़कर रहती थी, जो सिर से पाँव तक सजी रहती थी, जिसे हर कदम पर दुनिया की नज़र का ख़याल रहता था— आज वही लड़की थोड़ी-सी आवारा हो गई है। अब उसे सजने से ज़्यादा बिखरने में खुशी मिलती है। अब चेहरे पर बनावट कम और एक सच्ची-सी मुस्कान ज़्यादा है। शायद जब इंसान अपने भीतर का सच्चा प्रेम खोज लेता है, तो वह दुनिया को खुश करने की कोशिश छोड़ देता है। वह बस वही करने लगता है जिसमें उसका दिल सचमुच धड़कता है। मैं विज्ञान की विद्यार्थी थी। पौधों, जीव-जंतुओं और जीवन को किताबों में पढ़ा करती थी। लेकिन पता नहीं कब वही जीवन मेरी उँगलियों में उतर आया। अब मैं कागज़ पर चेहरे बनाती हूँ, जीव-जंतु बनाती हूँ, रेखाओं में भावनाएँ खोजती हूँ— और सबसे अजीब बात यह है कि मैंने इसके लिए कोई विशेष अभ्यास भी नहीं किया। बस हाथ चलता है… और चित्र बन जाता है। कभी-कभी खुद से पूछती हूँ— ये सब कब हुआ? शायद तब, जब मैंने खुद को बदलना नहीं, बल्कि खुद को जीना शुरू किया। शायद कला कहीं बाहर से नहीं आई… वो हमेशा मेरे भीतर थी। बस मैं इतनी देर तक उसे सुन ही नहीं पाई। विज्ञान ने मुझे जीवन को समझना सिखाया था, और कला अब मुझे उसी जीवन को महसूस करना सिखा रही है। और हाँ… वो लड़की अब सच में थोड़ी आवारा है— लेकिन पहली बार उसे अपनी इस आवारगी से बेहद प्यार है।














































