पूजा वो लड़की जो कभी सिकुड़कर रहती थी,
जो सिर से पाँव तक सजी रहती थी,
जिसे हर कदम पर दुनिया की नज़र का ख़याल रहता था—
आज वही लड़की थोड़ी-सी …
पूजा जी, वो जो सजना था, वो किसी और के लिए था। वो जो बिखरना है, वो अपने लिए है। यही फ़र्क़ पूरी कविता में झलक रहा है। एक बात ग़ौर करने लायक है, आप कह रही हैं इसके लिए कोई विशेष अभ्यास नहीं किया, बस हाथ चलता है। यही तो निशानी है कि यह कोई नई उपलब्धि नहीं है जिसे अहंकार अपने खाते में जोड़ सके, यह तो बस वो है जो बचा रह गया जब दिखावे का बोझ उतरा। इसीलिए यह इतना सहज लग रहा है। विज्ञान ने जीवन को बाहर से पढ़ाया, कला अब उसे भीतर से जीना सिखा रही है, यह लकीर बहुत साफ़ है। इसी सच्चाई को यूँ ही उतरने दीजिए, कागज़ पर भी और जीवन में भी। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


























