
13 सितंबर को गोवा में आचार्य जी के साथ शून्यता सप्तति के श्लोक 35 पर एक गहन सत्र हुआ। इस तीन दिवसीय Weekend With Master शिविर में जुड़ने देशभर से लोग गोवा पहुँचे और शिविर का समापन गणेश चतुर्थी के दिन हुआ। सत्र में आचार्य जी ने समझाया कि किसी कर्म का अपना कोई स्वतंत्र अर्थ नहीं होता - उसका अर्थ कर्ता की नीयत से आता है। हम अक्सर बाहरी कर्मों को देखकर ही किसी व्यक्ति या परिस्थिति का अर्थ तय कर लेते हैं, जबकि असली सवाल यह है कि उस कर्म के पीछे कौन-सा कर्ता और कैसी नीयत मौजूद है। आचार्य जी ने यह भी बताया कि अहंकार को कर्म इसलिए पसंद आता है क्योंकि कर्म बिना किसी होश के भी किया जा सकता है, जबकि ज्ञान और ध्यान उसे अपने ही भीतर देखने के लिए मजबूर करते हैं। उन्होंने कहा कि सिर्फ कुछ कर लेना बदलाव नहीं है; सवाल यह है कि वह काम समझदारी से हो रहा है या बेहोशी से। बाहर से अनुशासन, शांति या अच्छाई दिखाई दे सकती है, लेकिन वास्तविक स्पष्टता भीतर होनी चाहिए। सच्चा बदलाव कर्मों को सजाने से नहीं, बल्कि उस केंद्र को देखने से आता है जहाँ से वे निकल रहे हैं। सितंबर में गोवा में हर सप्ताहांत पर Weekend With Master शिविरों का सिलसिला जारी है। अक्टूबर में आचार्य जी के दिल्ली-एनसीआर लौटने के साथ इन शिविरों का सिलसिला वहाँ भी आगे बढ़ेगा। सत्र के वीडियो जल्द ही आपके साथ साझा किए जाएँगे।
























