
नमस्ते सभी को 🙏🪷 आज मैं कुछ बातें आप सबके साथ साझा करना चाहती हूं। आज मैं साफ़ देख पा रही हूं कि जब आचार्य जी सही संगति की बात करते है तो उनकी बातों का क्या अर्थ होता है। डर creativity को खा जाता है। अगर कोई मुझसे पूछे कि मेरी सबसे पुरानी दोस्त कौन है, तो मैं अपनी art का नाम लूँगी। बचपन से ही मैं कुछ न कुछ बनाती रहती थी। Drawing, painting, कुछ भी… मुझे बस बनाना अच्छा लगता था। लेकिन मैंने कभी इसे अपना talent नहीं समझा। मेरे लिए तो ये बस एक ऐसी चीज़ थी जो मैं करती थी। मैं ऐसी लड़की थी जो बहुत कम बोलती थी। स्कूल में भी ज्यादातर चुप रहती थी, हमेशा थोड़ी सहमी हुई। किसी से जाकर बात करना या दोस्त बनाना मेरे लिए बहुत मुश्किल था। लेकिन एक मज़ेदार बात थी। मैं लोगों से दोस्ती नहीं कर पाती थी, मेरी art कर लेती थी। आज सोचती हूँ तो लगता है कि अगर मेरी art मेरे साथ नहीं होती, तो शायद मेरे दोस्त भी नहीं होते। लेकिन मेरे आसपास art को कभी ऐसी चीज़ नहीं माना गया जिसे seriously लिया जाए। जब भी मुझे art करते हुए देखा गया, अक्सर डाँट ही पड़ी... “ये सब छोड़ो, करने वाले काम तो होते नहीं ” धीरे-धीरे मैंने art करना भी छुपाकर शुरू कर दिया। जब मन करता, चुपचाप कुछ बना लेती। किसी को दिखाने का भी मन नहीं करता था, क्योंकि पहले से पता होता था कि डाट ही पड़ेगी। फिर एक समय ऐसा आया कि मैंने art करना कब छोड़ दिया, मुझे खुद पता ही नहीं चला। घर पर पूरी आजादी दी गई मैं अपने कमरे में आजादी से घूम सकती थी और कुछ भी कर सकती थी घर के अंदर रहकर 🥴 घर के उस माहौल से निकलने के लिए मेरे सामने एक ही रास्ता दिखाई देता था....पढ़ाई करना और किसी तरह सरकारी नौकरी हासिल करके आर्थिक रूप से स्वतंत्र होना। इसलिए मैंने अपनी art को पूरी तरह किनारे कर दिया। मुझे लगा कि अभी इन सब चीज़ों के लिए समय नहीं है, पहले बस पढ़ाई पर ध्यान देना है। लेकिन परिणाम क्या हुआ? न तो पढ़ाई उस तरह हो पाई, और धीरे-धीरे अपनी कला से भी हाथ धो बैठी। आज पीछे मुड़कर देखती हूँ तो लगता है, यह कुछ वैसा ही था जैसे किसी के हाथ बाँधकर उसे दीवार से सिर टकराने के लिए कह दिया जाए और फिर उससे उम्मीद की जाए कि वह आगे बढ़ता रहे। जिस चीज़ को मैं अपनी समस्या का समाधान समझ रही थी, उसी प्रक्रिया में मैंने अपने भीतर की एक खूबसूरत चीज़ को दबा दिया। कभी डर के मारे और कुछ अपनी कहानियों के चलते जिनकी वजह से मैं पहले ही सब तय करके बैठ गई। Community में आने के बाद धीरे-धीरे मुझे समझ आने लगा कि माहौल और संगति का इंसान पर कितना असर होता है। जैसे-जैसे डर थोड़ा कम हुआ, मैं अपने साथ थोड़ी सहज होने लगी। और शायद उसी के साथ मेरे अंदर कुछ create करने की इच्छा भी वापस आने लगी। एक दिन अचानक मन किया...कुछ बनाती हूँ। कई साल बाद। सच में नहीं पता था कि मैं अभी भी बना पाऊँगी या नहीं। थोड़ी कोशिश की है। बहुत समय बाद थोड़ा सहज महसूस कर रही हूं। जैसे पहली बार सही काम किया हो खुद के मन का। और अपना मनपसंद काम करते-करते मैं आचार्य जी की कुछ बातें अब पहले से थोड़ी गहराई से समझ पा रही हूँ। जब आचार्य जी निष्काम कर्म की बात करते थे, तो पहले मुझे समझ नहीं आता था कि आखिर बिना किसी फल की इच्छा के काम करना कैसा होता है। लेकिन अब अपनी पेंटिंग बनाते हुए समझ आ रहा है। मैं पेंटिंग इसलिए नहीं बनाती कि उससे मुझे कुछ हासिल करना है। न उसे किसी को दिखाने के लिए बनाती हूँ, न इस उम्मीद में कि लोग उसकी तारीफ करेंगे। बस बनाने में अच्छा लग रहा होता है, इसलिए बनाती रहती हूँ। बाकी सब बस बोनस है। रंग भरते हुए, छोटी-छोटी चीज़ें बनाते हुए उस समय मेरा ध्यान बस उसी काम में होता है। और जब पेंटिंग पूरी हो जाती है, तो उसे देखकर भी अच्छा लगता है। अब समझ आ रहा है कि निष्काम कर्म का मतलब काम के परिणाम से बिल्कुल बेपरवाह होकर काम करना भर नहीं है, बल्कि ऐसा भी हो सकता है कि काम करते समय मेरा मन परिणाम में अटका ही न हो। मैं बस वह कर रही हूँ क्योंकि उस पल वही करना मुझे अच्छा लग रहा है। मेरी कला ने मुझे निष्काम कर्म को किसी परिभाषा से नहीं, बल्कि थोड़ा-सा जीकर समझाया है।
















































