
पहला ट्रैक अनुभव - आचार्य जी की शिक्षाओं को जीने का अनुभव। आचार्य जी की शिक्षाओं ने मुझे यह स्पष्ट करना सिखाया कि जीवन में क्या वास्तव में महत्वपूर्ण हैं और किन बातों को हम केवल डर और सुविधाओं के चलते चुनते हैं। और कुछ तो वास्तव में डर भी नहीं हैं। बस मन (अहंकार) की बनाई हुई कहानी है उसे कैसे अपने जीवन में सच मन लेते हैं। बिना तथ्यों के बारे में सोचे बिना। हाल ही मैंने अपने तीन और मित्रों के साथ इंद्रहार पास ट्रैक पूरा किया है। जोकि बिल्कुल भी आसान नहीं था। यह पूरा ट्रैक शारीरिक और मानसिक चुनौतियों से भरा हुआ था। यह ट्रैक 4 दिन का था। गाइड भैया ने बताया था ये ट्रैक बहुत मुश्किल हैं। ओर इस बात की थोड़ी पुष्टि हुई जब १२ लोगो के ग्रुप स्टार्ट किया आओ बस २ लोग ही समिट तक पहुँच पाये। इस ट्रैक में हर क्षण मुझे बहुत सचेत चुनाव करने थे। जिसमें हर एक क्षण आचार्य जी की शिक्षा मेरे साथ थीं। आचार्य जी बताते हैं। जब अहम् कर्ता भाव नहीं होता है तो कर्म तब भी होता है। पर तुम नहीं रह जाते हो वहां पर। उस कर्म का श्रेय लेने के लिए। आचार्य जी की शिक्षा और कबीर साहब के दोहे पुरी यात्रा में मेरे साथ रहें। जैसे आचार्य जी कहते है सीखने और समझना तब हुआ जब वह तुम्हारे जीवन में उतर रहा है और जब जीवन बन जाएं। कबीर साहब - भागे भला न होयगा, कहाँ धरोगे पाँव। सिर सौंपो, सीधे लड़ो, मत करो दुराव॥ हमने ट्रैक पर जलवायु परिवर्तन, शहरी प्रदूषण और कैसे बड़े शहरों से अपनी कामना के चलते या कह सकते है एक ट्रेंड को फॉलो करने के लिए लोग पहाड़ों पर आकर कैसे भोग रहे हैं। इसके बारे में बाते की आचार्य जी की शिक्षा के बारें में लोगों को बताया। सबने चर्चा में इंटरेस्ट लिया। कुछ लोग थे जो वहाँ भी बस मदिरा सेवन ही कर रहे थे जो ट्रैक को ५० प्रतिशत भी पूरा नहीं कर पाए थे। जब मैंने summit कंप्लीट किया तो सबको पर अच्छे से बात चीत किया कि ये हिम्मत और ताकत सिर्फ आचार्य जी की शिक्षा हैं। और जीवन में वास्तव महत्वपूर्ण क्या है? इसकी समझ क्योंकि हम बस बचाने में लगे है जबकि जितना मिला है उसको किसी चुनौतीपूर्ण सही कर्म को समर्पण कर दो। और इन 5 दिनों में मैने अपने भीतर शारीरिक और मानसिक अहंकार दोनों अनुभव् किया। और आगे भी बढ़ पाया हूँ। ट्रैक पर मैने अभी साथियों से आचार्य जी के बारें में चर्चा की और हमारे मूल ग्रंथ जैसे - गीता, उपनिषद् और कबीर साहब की सही समझ पर चर्चा की। यह ट्रैक केवल बस एक पहाड़ चढ़ने का अनुभव नहीं था। बल्कि डर, भ्रम, सुविधाएं और मान्यताओं और आदतों से ऊपर उठने की यात्रा थी। मैं अनुभव किया जब हम अपने दिन को शारीरिक और मानसिक चुनौतियों के साथ जीते हैं। तो न बीते हुए की यादों में होते है या आने वाले कल की योजना में। क्योंकि जो सामने है उसको सारा समर्पण चाहिए इस समय। अपने जीवन में आगे भी ऐसे अनुभवों के माध्यम से आगे बढ़ना और अपनी सीमाओं को आगे आगे बढ़ाता रहूँगा। अपने आप को एक सही को जीवन के लिए प्रेरित करना है।



















