
✍🏻 पोस्ट 14 | 19 सितम्बर '26 💭 विषय — इतिहास ────────── 🎖️ द ग्रेट इमू वार (1932): जब पक्षियों ने इंसानों को युद्ध में हरा दिया 🌾 1932, पश्चिमी ऑस्ट्रेलिया। प्रथम विश्व युद्ध के बाद लौटे सैनिकों को खेती के लिए ज़मीन दी गई थी। लेकिन सूखा और गेहूँ की गिरती कीमतों के बीच किसानों के लिए हालात पहले ही मुश्किल थे। तभी खेतों में हज़ारों इमू आने लगे। वे गेहूँ की फसलें खा रहे थे, बाड़ें तोड़ रहे थे और किसानों को लगने लगा कि उनकी सबसे बड़ी समस्या अब यही पक्षी हैं। किसानों ने सरकार से मदद माँगी। जवाब में सेना भेजी गई। मेजर G.P.W. मेरेडीथ के नेतृत्व में सैनिकों को "मशीन गन्स" दी गईं। विचार सीधा था: इतने बड़े झुंड को मशीनगन से नियंत्रित किया जा सकता है। 🐦 लेकिन मैदान में एमू किसी तय लक्ष्य की तरह खड़े नहीं थे। पहली मुठभेड़ में गोली चलते ही वे अलग-अलग दिशाओं में बिखर गए। जहाँ एक साथ कई पक्षी दिखाई देते, कुछ ही क्षणों में वे छोटे-छोटे समूहों में गायब हो जाते। एक मशीनगन जाम हुई और वाहन से गोली चलाने की कोशिश भी मुश्किल साबित हुई। सेना की पहली कोशिश रोकनी पड़ी। यह बात इतनी असाधारण थी कि ऑस्ट्रेलियाई संसद में भी इसका मज़ाक बना। सैनिकों को इस “युद्ध” के लिए पदक देने की बात उठी, तो सांसद ने व्यंग्य में कहा कि पदक तो इमुओं को मिलने चाहिए, क्योंकि अब तक हर दौर वे ही जीत रहे थे। बाहर से देखें तो समस्या साफ़ थी। एमू खेतों में आ रहे थे, फसलें नष्ट हो रही थीं। इसलिए समाधान भी साफ़ लगता था: इमुओं को हटाओ। लेकिन यहीं कहानी को थोड़ा पीछे देखना ज़रूरी है। 🌱 इमू अचानक उस जगह पैदा नहीं हुए थे। वे स्वभाव से ही घूमने वाले पक्षी हैं और भोजन तथा पानी के बदलते स्रोतों के साथ लंबी दूरी तय करते हैं। लेकिन जिस भू-दृश्य में वे घूम रहे थे, वह अब पहले जैसा नहीं था। खेती के लिए ज़मीन बदली गई थी, गेहूँ उगाया जा रहा था, बाड़ें बनाई गई थीं और पशुपालन आधारित बसावट (pastoral settlement) के साथ नए जलस्रोत भी बनाए गए थे। 💧 बाद के CSIRO अध्ययनों में भी पाया गया कि pastoral settlement से बने अतिरिक्त जलस्रोतों वाले क्षेत्रों में एमुओं की संख्या आसपास के निर्जन क्षेत्रों की तुलना में कई गुना अधिक हो सकती थी। 🌾 तब सवाल सिर्फ़ यह नहीं रह जाता कि खेतों में इमू क्यों दिखाई दे रहे थे। सवाल यह है कि पूरी बदल चुकी परिस्थिति में हमारी नज़र सबसे पहले किस पर गई। भू-दृश्य बदल चुका था। भोजन और पानी की उपलब्धता बदल चुकी थी। इमुओं की आवाजाही भी उसी बदली हुई परिस्थिति का हिस्सा थी। लेकिन जब परिणाम सामने आया, तो दिखाई हमें सिर्फ़ इमू दिए। इमू दिखाई दिए। इमू समस्या बन गए। और समस्या को हटाना ही समाधान लगने लगा। 🪞 हमारे लिए बाहर की समस्या को देख लेना आसान है। कठिन यह देखना है कि जिस परिस्थिति से परेशानी पैदा हुई, उसे बनाने में हमारा भी योगदान था। अहंकार अपने किए हुए बदलाव को परिस्थिति मान लेता है और उसके परिणाम को बाहरी समस्या। फिर बुद्धि उसी समस्या का समाधान खोजने में पूरी ताकत लगा देती है। क्योंकि बाहर कुछ बदलते रहना, भीतर देखने से बचने का आसान रास्ता है। अहंकार इसलिए परिस्थिति को बदलने में लगा रहता है, ताकि देखने की दिशा कभी अपनी ओर न मुड़े। ❓ जब समस्या हमारे ही बनाए हुए बदलावों का परिणाम हो सकती है, तो क्या हम समस्या को हटाने से पहले अपने किए हुए बदलावों को देखने के लिए तैयार होते हैं? 🌐 स्रोत: https://www.naa.gov.au/blog/environmental-issues-not-so-distant-past https://www.scientificamerican.com/blog/running-ponies/the-great-emu-war-in-which-some-large-flightless-birds-unwittingly-foiled-the-australian-army/
















































