
✍🏻 पोस्ट 1 | 19 सितंबर '26 💭 विषय — पर्यावरण एवं जलवायु ────────── 🌍भारत का भूजल: संकट जो हर साल गहरा रहा है भारत में भूजल की कमी कोई नई बात नहीं है लेकिन अब चिंता सिर्फ यह नहीं है कि भूजल स्तर नीचे है, चिंता यह है कि यह गिरावट लगातार कई वर्षों से बनी हुई है। 🌍 World Meteorological Organization (WMO) की State of Global Water Resources 2025 रिपोर्ट के अनुसार, भारत समेत दुनिया के कई हिस्सों में 2022 से 2025 तक लगातार भूजल की कमी देखी गई। इसके पीछे एक बड़ा कारण है: जितना भूजल निकाला जा रहा है, उतना वापस धरती में नहीं पहुंच पा रहा। 📉 2025 में दुनिया के 34% भूजल मापन केंद्रों पर भूजल स्तर सामान्य से नीचे या बहुत नीचे दर्ज किया गया। 2024 में यह आंकड़ा 25% था। यानी एक साल में सामान्य से कम भूजल स्तर वाले मापन केंद्रों का हिस्सा काफी बढ़ गया। भारत में यह समस्या खासकर उत्तर और उत्तर-पश्चिमी हिस्सों में लंबे समय से दिखाई दे रही है। 🇮🇳 2025 में उत्तरी भारत में जमीन पर मौजूद कुल जल भंडारण भी सामान्य से नीचे रहा। इसका मतलब सिर्फ कुओं का पानी कम होना नहीं है। यह पूरे जल संतुलन पर लंबे समय से बन रहे दबाव की ओर इशारा करता है। 🌊 2025 में दुनिया की नदियों ने तीन दशकों से ज्यादा समय में सबसे सूखे वर्षों में से एक देखा। 🏔️ लगातार चौथे साल दुनिया के हर बड़े हिमनद क्षेत्र में बर्फ का द्रव्यमान कम हुआ। 🌍 जमीन पर मौजूद कुल जल भंडारण में भी 2014–16 के बाद से लगातार गिरावट देखी गई है। यानी संकेत अलग-अलग जगहों से आ रहे हैं, लेकिन कहानी एक ही है: मीठे पानी के भंडार पर दबाव बढ़ रहा है और भूजल की समस्या इसलिए और गंभीर है क्योंकि यह हमारी आँखों के सामने दिखाई नहीं देती। तालाब सूख जाए तो हमें दिखता है, नदी का पानी कम हो जाए तो दिखता है लेकिन जमीन के नीचे का पानी धीरे-धीरे खत्म होता रहता है। जब तक इसका असर साफ दिखाई देता है, तब तक इसे वापस भरना मुश्किल हो सकता है। 🪞 लेकिन यहाँ एक और सवाल उठता है, हम प्रकृति से इतना लेते ही क्यों हैं? सिर्फ जरूरत के लिए? या जरूरत से कहीं आगे जाकर अपनी इच्छाओं, सुविधा और उपभोग को लगातार बढ़ाने के लिए? 🧠 यहाँ समस्या केवल पानी की कमी या संसाधनों का गलत प्रबंधन नहीं है। मूल सवाल उस अहंकार का है जो बाहरी चीज़ों के अधिक-से-अधिक उपभोग में अपनी तृप्ति खोजता है। जब अधिक पाना ही जीवन का लक्ष्य बन जाता है, तो नदी पानी नहीं रहती - वह उपयोग की चीज़ बन जाती है। जमीन सिर्फ जमीन नहीं रहती, वह उत्पादन का साधन बन जाती है। प्रकृति धीरे-धीरे हमारे उपभोग की वस्तु बनती जाती है। 🌍 तब पर्यावरण का संकट केवल बाहर का संकट नहीं रह जाता। हमारे भीतर की चाहतें ही बाहर संसाधनों पर दबाव बनकर दिखाई देने लगती हैं। सवाल यह नहीं कि पानी कितना बचा है। सवाल यह है कि मेरी जरूरत कहाँ खत्म होती है और मेरा अहंकार कहाँ से अधिक माँगना शुरू करता है? 👁️ अगर हम यह नहीं देखेंगे, तो तकनीक पानी निकालने के और बेहतर तरीके दे सकती है, लेकिन अधिक पाने की वही चाहत उन संसाधनों पर फिर दबाव बनाएगी। 💭 इसलिए असली सवाल शायद यह है: क्या हम पानी की कमी से जूझ रहे हैं, या उस उपभोग की भूख से जिसे पूरा करने के लिए पानी भी कम पड़ रहा है? 📌 स्रोत: 🔗 Down To Earth https://www.downtoearth.org.in/water/indias-groundwater-in-persistent-decline-warns-un-report 🔗 World Meteorological Organization https://wmo.int/resources/publication-series/state-of-global-water-resources/2025















































