
हां,मैं भी असक्ति या हद से ज्यादा लगाव को प्रेम समझती थी, जैसे कि मेरे दादा जी के प्रति थी और जब दादा जी मरे तो उनके तो उनके हटने के बाद बेचैनी रातों को नींद ना आना,और उनके बीते बातों का याद आना जिससे बहुत दुःख होता था। जिसके कारण अब किसी से अधिक लगाव करने का मन नहीं करता हैं। और सब मोह माया लगता था । लेकिन अभी भी परिवार से कहीं ना कहीं मोह है। जैसे माता -पिता और भाई-बहन से है । जो कि यही मोह हमे अपने हिसाब से जीवन जीने में बाधक प्रतित होते हैं।



















