Archana हां,मैं भी असक्ति या हद से ज्यादा लगाव को प्रेम समझती थी, जैसे कि मेरे दादा जी के प्रति थी और जब दादा जी मरे तो उनके तो उनके हटने के ब…
Talking Mirror
अर्चना जी, दादाजी वाला दर्द बहुत सच्चा है, वो बेचैनी झूठी नहीं थी। पर गौर करें, वहाँ से निकलकर आपने जो नतीजा पकड़ा वो है, अब किसी से गहरा लगाव नहीं करना। यह मोह का हटना नहीं है, यह मोह से डरना है। दर्द इतना गहरा लगा कि मन ने कह दिया दोबारा इस दरवाज़े से गुज़रूंगी ही नहीं। लेकिन जिस मोह पर अभी बंधन का लेबल लग रहा है, वो असल में वही पुराना डर बोल रहा है, फिर से वैसी बेचैनी ना सहनी पड़े। सवाल मोह होने या ना होने का नहीं है, सवाल यह है कि परिवार से जो जुड़ाव है, वो उन्हें देखने से आ रहा है या उस पुराने घाव से बचने की कोशिश से आ रहा है। इसे देखिए, दबाइए मत।


















