
✍🏻 पोस्ट 9 | 4 अक्टूबर '26 💭 विषय — इतिहास ──────── 🐜 लाख की चूड़ियों के पीछे कितने छोटे जीवों की मौत होती है? आपने लाख की चूड़ियाँ देखी होंगी। रंग-बिरंगी, चमकदार और भारतीय हस्तशिल्प की पहचान। लेकिन जिस लाख से ये चूड़ियाँ बनती हैं, वह किसी पेड़ पर उगने वाला निर्जीव पदार्थ नहीं है। लाख, लाख कीट (Kerria lacca) नाम के एक छोटे स्केल कीट से मिलती है। यह कीट पलाश, कुसुम और बेर जैसे पेड़ों की टहनियों पर रहता है और उनका रस चूसता है। मादा कीट एक कठोर, चिपचिपा रेज़िन छोड़ती है, जो उसके चारों ओर जमकर परत बना लेता है। 🌳 समय के साथ टहनियाँ लाख की मोटी परत से ढक जाती हैं। इन्हीं टहनियों को काटकर या खुरचकर स्टिकलैक प्राप्त किया जाता है। यहीं एक असहज सवाल खड़ा होता है। कटाई और प्रॉसेसिंग के दौरान लाख में मौजूद मादा कीट मर जाती हैं। एक आम तौर पर उद्धृत अनुमान के अनुसार, एक किलोग्राम लाख के उत्पादन में लगभग 3 लाख कीट मर सकते हैं। यह संख्या अनुमानित है, निश्चित गणना नहीं। 🔥 स्टिकलैक को पीसकर और धोकर साफ किया जाता है। फिर उससे सीडलैक और आगे शेलैक बनाया जाता है। इसी शेलैक का इस्तेमाल चूड़ियों के अलावा लकड़ी की पॉलिश, कुछ मिठाइयों और फलों की कोटिंग तथा कई औद्योगिक उत्पादों में भी होता है। 📜 सदियों से लाख का इस्तेमाल भारत में सरकारी पत्रों और अदालती दस्तावेज़ों पर मुहर लगाने के लिए होता रहा है। इसके अलावा चूड़ियों और लकड़ी की पॉलिश में भी इसका उपयोग हुआ, और शेलैक से पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्ड बनाए जाते थे। लाख उन चुनिंदा वन-उत्पादों में था, जिनके अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में भारत का लगभग एकाधिकार था। सिंथेटिक विकल्पों की खोज और थाईलैंड के उभरने के बाद यह दबदबा टूटा। भारत आज भी लाख के बड़े उत्पादकों में है। झारखंड अकेले सालाना लगभग 10,000 मीट्रिक टन लाख पैदा करता है और यह झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश व ओडिशा के हज़ारों आदिवासी परिवारों की आजीविका है। शेलैक का उपयोग दवाओं की कोटिंग से लेकर रक्षा क्षेत्र तक में होता है। लेकिन सवाल यह है कि अपनी सुविधा और सौंदर्य के लिए हम दूसरे जीवों के जीवन को कितना महत्व देते हैं? समस्या केवल हिंसा की नहीं, उस वृत्ति की है जो अपनी सुविधा को केंद्र में रखकर बाकी जीवन को उपभोग की वस्तु मान लेती है। 🐜 सवाल लाख की चूड़ियों से कहीं बड़ा है। क्या हम अपने सुख की कीमत में शामिल उस हिंसा को देखने के लिए तैयार हैं, जिसे देखने की कभी ज़रूरत ही नहीं पड़ी? स्रोत: https://www.britannica.com/topic/lac-resinous-secretion
















































