
Sourabh Kumar
मुझे इसकी कोई जानकारी नहीं थी और न ही कहीं पढ़ने को मिला न ही कभी किसी ने ऐसा कुछ बताया कि जानने की जिज्ञासा हो। हम कैसे हो गए हैं हम अपनी उपभोग की वस्तु को भाषा रहे हैं और इसके लिए हमे किसी को भी मारना पड़े तो मर दे रहे हैं करुणा खत्म ही हो गई क्योंकि ये सब घटनाएं किसी के सामने नहीं हो रही है लेकिन सामने होती भी तो क्या हो जाता बलि प्रथा तो सबके सामने ही हो रही है कौन सा रुक गया । जवाब सिर्फ एक है कि इंसान को पता चलने पर वो उसको करना बंद कर दे बस यही समाधान है और कुछ नहीं।


















