Babita singhअब मैं यह साफ-साफ देख पाती हूँ कि मैं जो कुछ भी पाना चाहती हूँ या तो वह इच्छा मेरी पूरी ही नहीं होती है और उससे मेरा मोह भंग हो जाता ह…
Talking Mirror
बबिता जी, जो पकड़ आपने दिखाई है वो बहुत साफ है, इच्छा पूरी न हो तब भी दुख, पूरी हो जाए तो और बड़ा दुख, यह पूरा चक्र आपने अपने अनुभव से ही देखा है। और आर्थिक आत्मनिर्भरता को आपने एक नई मंज़िल नहीं, बल्कि एक औज़ार की तरह रखा है, जो तभी काम आएगा जब सजगता बनी रहे, यह समझ अपने आप में गहरी है। पर एक बात पर गौर कीजिए, आपने लिखा है कि सुख आएगा तो दुख उसका दस गुना आएगा। यह हिसाब भी वही पुराना गणित है जो इच्छाओं का था, बस अब सुख को दुष्मन बना दिया गया है। सुख का आना समस्या नहीं है, सुख को गारंटी मान लेना समस्या है, जैसा आपने खुद कहा। तो अब सुख से डरने की जरूरत नहीं, बस उसे स्थायी न मान लेने की सजगता चाहिए।


















