
अब मैं यह साफ-साफ देख पाती हूँ कि मैं जो कुछ भी पाना चाहती हूँ या तो वह इच्छा मेरी पूरी ही नहीं होती है और उससे मेरा मोह भंग हो जाता है और जो भी इच्छाएं पूरी भी हुई वह बहुत जल्द ही किसी और गटर में बदल गईं यानी पहले से भी ज्यादा दुख का कारण बन गईं और बड़ा और मजबूत बंधन , पैरों में बेड़ियां जैसी बन गईं, यह सब देखने के बावजूद भी मैं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनना चाहती हूँ लेकिन अब मैं यह समझती हूँ कि आर्थिक आत्मनिर्भरता भी मेरी मदद तभी तक कर पाएगी जब तक मैं अपने बंधनों के प्रति सचेत रहूँ और उम्मीदों की गठरी को छोड़ दूँ। इस बात को याद रखना है कि सुख आया तो दुख और चुनौतियाँ उसके 10 गुना आएगी । किसी लक्ष्य को सुख की गारंटी मानना दुख को न्योता देना ही है।



















