
🌿मुझे लगता है, मैं कई बार सच जानना चाहती हूँ, लेकिन शायद उतना ही सच, जितना मेरी पहले से बनी हुई सोच को न हिलाए। जिस बात को मैं सही मानती हूँ, उसके पक्ष में कोई तर्क मिल जाए तो मुझे अच्छा लगता है, लेकिन उसके विरुद्ध कोई बात आ जाए तो मन तुरंत उसे स्वीकार नहीं करता। अब सवाल यह है कि अगर मुझे सच में जानना है, तो अपनी पसंद की बात सुनकर मुझे संतोष और उसके विरुद्ध बात सुनकर बेचैनी क्यों होती है? क्या मुझे सच चाहिए, या अपने सही होने का भरोसा?👀 मुझे लगता है, किसी धारणा को छोड़ना केवल अपनी एक बात गलत मानना नहीं होता। कभी-कभी उसके साथ हमारी बरसों की सोच, परिवार से मिली मान्यताएँ और अपनी पहचान भी जुड़ी होती हैं। इसलिए जब कोई उस धारणा पर सवाल उठाता है, तो हम उसकी बात जाँचने से पहले खुद को बचाने लगते हैं। हम यह नहीं पूछते कि उसकी बात में कितना सच है; हम पूछने लगते हैं कि वह मुझे गलत कैसे कह सकता है। मार्शल की घटना से यह समझ आता है कि किसी बात पर दृढ़ विश्वास होना और उसका सच होना अलग बातें हैं। लेकिन अपने विश्वास को जाँचना केवल दूसरों से सवाल पूछना नहीं है; अपने निष्कर्षों को भी सवालों के सामने रखना है।🧠



















