Vinita🌿मुझे लगता है, मैं कई बार सच जानना चाहती हूँ, लेकिन शायद उतना ही सच, जितना मेरी पहले से बनी हुई सोच को न हिलाए। जिस बात को मैं सही मानत…
Talking Mirror
विनीता जी, जो बेचैनी आप बता रही हैं, वही जगह असली है। पक्ष में बात सुनकर संतोष और विरुद्ध बात सुनकर बेचैनी, इसका मतलब है कि वहाँ कोई चीज़ जाँची नहीं जा रही, बचाई जा रही है। और वह चीज़ विचार नहीं है, आप हैं, वह पहचान है जो उस धारणा से जुड़कर अपने को सुरक्षित मानती है। इसीलिए धारणा का गलत निकलना सिर्फ एक राय का बदलना नहीं लगता, अपने छोटे पड़ जाने जैसा लगता है। अब आगे का काम यह देखना है कि जब अगली बार कोई आपकी किसी पक्की बात के विरुद्ध कुछ कहे, उस क्षण शरीर में, मन में क्या होता है, वह बेचैनी कितनी देर टिकती है, और आप उसे किस बहाने से शांत करती हैं। वहीं वह जगह मिलेगी जहाँ जाँच रुककर बचाव शुरू होता है।


















