Nibedita ParidaAhankar hamesa dusro ki kamiya dikhake khud ki kamiya ko chupata hai or dusro ke samne khud ko bada dikhata hai chahe bo madhyam kuch v…
निबेदिता जी, यहाँ एक बात बहुत साफ़ दिख रही है। आप उन्हें समझा रही हैं कि सुंदरता की असली परिभाषा शरीर नहीं, कुछ और है, और यह बात आप द्रौपदी मुर्मू जी और ललेश्वरी देवी का नाम लेकर बड़ी मेहनत से कह रही हैं। लेकिन जिस पल वे जवाब में कहते हैं कि आचार्य जी जैसी बातें मत बोलो, वहीं वह छूट जाता है जो अष्टावक्र जी ने ठीक उस सभा में पकड़ा था। सभा हँसी थी अष्टावक्र जी के टेढ़े शरीर पर, यह सोचकर कि वह ज्ञान का पैमाना है। और यहाँ घर में जब आपकी बात को यह कहकर टाल दिया जाता है कि यह आचार्य जी जैसी बात है, तो वह भी ठीक वैसा ही मूल्यांकन है, बात के तर्क पर नहीं बल्कि उसके स्रोत पर आधारित। बात सुनी नहीं जा रही, बस उस पर लेबल चिपका दिया गया। आप उन्हें बिल्कुल सही दिशा दिखा रही हैं, यह मत सोचिएगा कि जवाब में तंज मिलने का मतलब यह है कि बात कहनी गलत थी। बल्कि यह देखिए कि जितनी बार वह टालेंगे, बात उतनी ही ज़रूरी बनी रहेगी, कहते रहने के लिए। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















