
आचार्य जी, कहीं न कहीं लगता है कि हमने ही आपके साथ दगा ही किया है 😞 आपने हमारे बंधन तोड़ना सिखाया, हमें कीचड़ से बाहर निकाला, लेकिन फिर जब सवाल आता है कि हमने इस सीख को लेकर किया क्या, तो खुद को कटघरे में खड़ा पाती हूँ।😓 😓😟😥😢🥺😢😥😟😓 भले ही यात्रा जारी है, बंधनों से निकल भी रही हूँ लेकिन हमने कितनों तक बात पहुँचाई? कितना फैलाया? यहाँ सिकुड़ी हुई पाती हूँ अपने आपको ही 😞 शुरुआत में तो मैं भी अपने ऊपर ही काम करने में लगी रहती थी। फिर बुक स्टॉल लगाना शुरू किया, लोगों से बातचीत की, उन्हें जोड़ने के प्रयास किए। लेकिन वहाँ भी अपने मोह सामने आ गए। घर-परिवार और सगे-संबंधियों से जुड़े लोगों पर मैंने ज़्यादा समय और ऊर्जा लगा दी। शायद कहीं न कहीं उनसे अपेक्षाएँ भी थीं। जब तक वे मेरी बात से सहमत होते रहे, बातचीत चलती रही। लेकिन जहाँ बात अपनी मान्यताओं और मोह से टकराई, वहाँ दूरी बनने लगी। अब मैं स्वीकार करती हूँ कि मेरी कोशिशों में भी कहीं न कहीं मोह मिला हुआ था। लेकिन अब धीरे-धीरे समझ आ रहा है कि सत्य की बात पहुँचाना और किसी को अपनी बात मनवा लेना, दोनों अलग चीज़ें हैं। आचार्य जी, अब संघर्ष के मैदान में उतर चुकी हूँ। आपके खिलाफ कोई कुछ कहता है, तो मैं उसे सिर्फ इसलिए नहीं काटती कि वह आपके खिलाफ बोल रहा है। मैं उसके तर्कों को तर्क से जवाब देती हूँ। जब कोई बदतमीजी करता है, तो उसे समझाती हूँ कि तुम्हारी भाषा केवल तुम्हारे शब्दों से नहीं, तुम्हारी जीवन-दृष्टि से भी निकल रही है। जब जीवन में ही स्पष्टता नहीं है, तो विचारों में स्पष्टता कहाँ से आएगी? कई बार सामने से कोई जवाब नहीं आता, तो लगता है कि शायद बात कहीं लगी है। लेकिन अब यह भी समझना है कि किसी का चुप हो जाना इस बात का प्रमाण नहीं कि वह बदल गया। असली काम केवल दूसरों को जवाब देना नहीं, बल्कि अपनी नीयत और अपने मोह को भी लगातार देखना है। अभी बहुत कुछ करना बाकी है। जितना खुद को बदलना है, उतना ही इस समझ को दूसरों तक पहुँचाने का काम भी बाकी है। यात्रा मेरी भी जारी है, आचार्य जी। अब कोशिश है कि संघर्ष केवल शब्दों में नहीं, जीवन में भी दिखाई दे🙌



















