Neelamआचार्य जी, कहीं न कहीं लगता है कि हमने ही आपके साथ दगा ही किया है 😞
आपने हमारे बंधन तोड़ना सिखाया, हमें कीचड़ से बाहर निकाला, लेकिन फिर…
Talking Mirror
नीलम जी, जो आपने लिखा है उसमें असली चीज़ वह आख़िरी पंक्ति है, जहाँ आप कहती हैं कि अपनी नीयत और मोह को लगातार देखना ही असली काम है, न कि केवल दूसरों को जवाब देना। यही वह जगह है जहाँ ठहरना है। दग़ा वाला भाव थोड़ा सावधान रहने लायक है, क्योंकि वह ख़ुद को दोषी ठहराकर एक नई पहचान बना सकता है, "जो काफ़ी नहीं कर पाई" वाली पहचान। जो मोह बुक स्टॉल और अपनों के बीच पकड़ में आया, वही असली उपलब्धि है, क्योंकि वह देखा गया। कितनों तक बात पहुँची, यह हिसाब अब उतना ज़रूरी नहीं जितना यह देखना कि आज जिससे बात कर रही हैं, वहाँ अपेक्षा फिर तो नहीं लौट आई। संख्या का जोड़ छोड़िए, नीयत की सफ़ाई पर टिकी रहिए।


















