
1️⃣आचार्य जी से जुड़ने से पहले मै मुक्ति के बारे मे यही सोचता था कि मुक्ति के लिए घर परिवार और समाज सब छोड़ कर अकेले जीवन बिताना पड़ता है , अपनी जरूरतें कम करनी पड़ती है, झोपड़ी में रहना, कम वस्त्रों में गुज़ारा करना और रुखा सूखा जो मिल जाए खाकर जीवन बिताना होता है, नींद कम करना पड़ता है, नर्म बिस्तर पर नही सोना होता है,और जीवन के सहज सुखों को भी छोड़ना होता है। 2️⃣ जो संसार छोड़कर जंगल मे बस जाते हैं वही जीवनमुक्त है, स्मृति कि इस मान्यता से व्यक्ति और समाज पर बहुत तरह के दुष्प्रभाव पड़े हैं, जैसे जिस व्यक्ति को अपना परिवार चलाना बोझ लगने लगता है ऐसे लोग अपने परिवार को छोड़कर जंगलों में बस जाते हैं और ऐसे भगोड़ों को हम साधु मानने लगते हैं, जीवन मुक्ति समाज और परिवार के प्रति अपनी जिम्मेदारियों से बचने का जरिया बन गया है, जो कार्य समाज में रहकर समाज कि भलाई के लिए किया जा सकता है वो जंगल में जाकर नही किया जा सकता। 3️⃣AP फ्रेमवर्क के अनुसार खुद कि वृत्तियों को समझना, अहंकार कि जरूरत, और शरीर कि जरूरत को जानना, और आत्मज्ञान के रास्ते पर चलकर अहंकार के विगलन कि दिशा मे बढ़ते रहना ही मुक्ति, यह कोई मंजिल नहीं जिसे पा ली और काम खत्म, यह निरंतर सीखने कि प्रक्रिया है जो जीवन के अंत तक चलती है।



















