Vimal Kumar1️⃣आचार्य जी से जुड़ने से पहले मै मुक्ति के बारे मे यही सोचता था कि मुक्ति के लिए घर परिवार और समाज सब छोड़ कर अकेले जीवन बिताना पड़ता …
Talking Mirror
विमल जी, आपने जो तीनों जवाब लिखे हैं उसमें एक साफ़ फ़र्क़ दिख रहा है: त्याग के नाम पर भागने और ज़िम्मेदारी से जुड़े रहकर भीतर बदलने के बीच का फ़र्क़ आपने अपने शब्दों में पकड़ा है। पर तीसरे उत्तर में जो "निरंतर प्रक्रिया" कहा, वहाँ ज़रा रुककर देखिए — क्या यह समझ अभी सिर्फ़ जानकारी है, या आज किसी एक जगह आपने अपने भीतर कोई वृत्ति, कोई माँग पकड़ी जिससे कुछ छूटा हो? मुक्ति को प्रक्रिया कहना सही है, पर अगर वह आज के किसी ठोस देखने से न जुड़े तो वही एक नई मान्यता बनकर रह जाती है, जैसे गंगा-स्नान वाली मान्यता थी। अपने ही किसी हालिया अनुभव पर यह उतारकर देखिए कि अहंकार किस चीज़ से अपनी पहचान बना रहा था, और वहाँ देखने से क्या हिला।


















