
✍🏻 पोस्ट 27 | 28 सितंबर '26 💭 विषय — भूगोल ────────── ⛰️ भूस्खलन क्यों होते हैं और भारत में कहाँ सबसे बड़ा खतरा है? 🌧️ जुलाई 2026 में जम्मू-कश्मीर के रियासी ज़िले की त्रिकुटा पहाड़ियों में हिमकोटी मार्ग पर भारी बारिश के बाद भूस्खलन हुआ। रास्ते पर मलबा आया और बैटरी कार सेवा को कुछ समय के लिए रोकना पड़ा। 👉 यह घटना बताती है कि पहाड़ी क्षेत्र में बारिश और ढलान की अस्थिरता कितनी जल्दी समस्या बन सकती है। 🌍 भूस्खलन तब होता है जब ढलान पर मौजूद मिट्टी, चट्टान या मलबा गुरुत्वाकर्षण के कारण नीचे खिसकने लगता है। तेज़ बारिश इसका एक बड़ा कारण है। पानी मिट्टी में जाता है, उसका भार बढ़ाता है और कई परिस्थितियों में उसकी पकड़ कमजोर करता है। नदी या नाले द्वारा ढलान के नीचे का कटाव भी उसे अस्थिर कर सकता है। 🏔️ हिमालय इस खतरे के लिए विशेष रूप से संवेदनशील है। यह युवा और भूगर्भीय रूप से सक्रिय पर्वत-प्रणाली है। भारतीय और यूरेशियाई प्लेटों की टक्कर आज भी जारी है। इसलिए यहाँ कई ढलान भूगर्भीय रूप से अस्थिर हैं। भारी बारिश और भूकंप जैसी घटनाएँ ऐसी ढलानों को और कमजोर कर सकती हैं। 📍 भारत में लगभग 4.2 लाख वर्ग किमी, यानी बर्फ से ढके क्षेत्र को छोड़कर लगभग 12.6% भूभाग, भूस्खलन के खतरे वाला माना गया है। इसमें उत्तर-पूर्वी हिमालय, उत्तर-पश्चिमी हिमालय, पश्चिमी घाट और कोंकण की पहाड़ियाँ तथा अराकू क्षेत्र शामिल हैं। 🛣️ खतरा केवल प्राकृतिक नहीं है। सड़क बनाने के लिए पहाड़ काटना, खनन, अनियोजित निर्माण, पेड़ों और वनस्पति को हटाना तथा प्राकृतिक जल निकासी में बदलाव ढलान की स्थिरता को प्रभावित कर सकते हैं। 📊 2026 में केंद्र सरकार ने भी हिमालयी क्षेत्रों में अत्यधिक वर्षा, भूस्खलन और बाढ़ के बढ़ते जोखिम के संदर्भ में जलवायु परिवर्तन तथा मानव गतिविधियों दोनों को महत्वपूर्ण कारक बताया है। 🌳 पेड़ कोई जादुई सुरक्षा-कवच नहीं हैं, लेकिन वनस्पति की जड़ें मिट्टी को बाँधने और सतही कटाव कम करने में मदद करती हैं। इसलिए पहाड़ को काटकर फिर केवल कुछ पेड़ लगा देना पर्याप्त समाधान नहीं है। ढलान, पानी, वनस्पति और निर्माण, चारों को साथ समझना पड़ता है। 🛰️ ISRO के Landslide Atlas में 1998 – 2022 के दौरान भारत में लगभग 80,000 भूस्खलनों का डेटाबेस तैयार किया गया है, जिसमें हिमालय और पश्चिमी घाट के 17 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों के संवेदनशील क्षेत्र शामिल हैं। 🪞 अहंकार अपनी चाह को ही पर्याप्त मानता है। उसे जितना मिलता है, उतना ही और चाहिए। इसलिए प्रकृति उसके लिए जीवन नहीं, भोग की वस्तु बन जाती है। जंगल, पहाड़, नदियाँ, ज़मीन सब उसकी बढ़ती हुई चाह को पूरा करने के साधन बन जाते हैं। 🌱 प्रकृति को बचाने की बात करने से पहले हमें अपने उपभोग को देखना होगा। क्योंकि समस्या सिर्फ़ बाहर की व्यवस्था में नहीं है। जब भीतर की चाह असीम हो, तो बाहर के संसाधन कितने भी हों, कम पड़ते जाते हैं। और जब मनुष्य अपनी चाह को देखना शुरू करता है, तभी यह सवाल उठता है कि मुझे वास्तव में कितना चाहिए? ❓ जिस पहाड़, जंगल और ज़मीन से मैं अपनी सुविधा ले रहा हूँ, क्या मैंने कभी देखा है कि उसकी कीमत कौन चुका रहा है? 🔗 source https://gsi.gov.in/landslide-hazard/ https://www.isro.gov.in/Landslide_Atlas_India.html
















































