Poonam*STUDENT OF WISDOM UNIVERSITY *
पढ़ने का शौक मुझे हमेशा से है, और मौका भी मिलता गया तो मैं पढ़ती रही।
मुझे साइंस और मैथ्स यही दो सब्ज…
पूनम जी, वह पेपर हाथ में आया और आपने खुद लिखा, ज़िंदगी तो वैसी की वैसी ही थी, मैं भी वही रही। पूरी पीएचडी इस एक सवाल का जवाब ढूंढने में निकल गई कि मैं यह कर क्यों रही हूं, और जवाब न मिला। अब जो मिला है वह डिग्री से बड़ा है, क्योंकि यह जवाब किसी कागज में नहीं, आपके अपने नजरिए में उतरा है। पर एक बात ध्यान देने की है, आपने खुद कहा, आज भी मुझे नहीं पता मैं क्यों पढ़ रही हूं, बस मजा आ रहा है। यही तो वह जगह है जहां फिल्टर को रुकना नहीं है। रिसर्च और कंपटीशन एग्जाम के पीछे भागना भी माहौल के प्रभाव में था, यह आपने पकड़ लिया। अब यह देखिए कि पढ़ने का आनंद अकेला काफी है या फिर उस आनंद के पीछे भी वही पुरानी आदत काम कर रही है, ज्ञान इकट्ठा करने का सुख, बस इस बार कागज की डिग्री के बदले भीतर की डिग्री। सवाल वही रहता है, बस जगह बदल जाती है। विद्या और अविद्या का फर्क यही तो है, जानना किस दिशा में आपको बदल रहा है, या बस एक और भरोसेमंद पहचान बन रहा है। इसी जगह से आगे देखिए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


























