
अब तो थोड़ी सी काम हो गई है पर पूरी तरीके से नहीं पहले मेरे अंदर एक आदत थी मुझे लगता था कि अगर मैं कोई भी दहलीज पर करूंगा तो उसे टाइम पर मेरे दिमाग में जो भी इमेज होगी उसकी हैबिट्स मेरे अंदर आ जाएंगे और उसी के जैसा मेरे दिमाग का स्ट्रक्चर बन जाएगा यह बड़ी अजीब सी आदत थी पर मुझे नहीं बताइए कहां से आई शायद साइकोलॉजी में इसको ऑब्सेसिव कंपल्सिव डिसऑर्डर बोलते हैं मैं बहुत ही करता था और मंदिर के सामने से जैसे गुजारा तो कोई विचार आ गया तो फिर मुझे डर लगता था मुझे पता था कि ऐसा कुछ नहीं होगा मैं एक बार बोल दिया मन में तो उल्टे-फटे थॉट्स आते हैं लाइक फैलियर किया फिर कुछ भी लेकिन मुझे लगता था कि भगवान सुन के कहीं मेरा बुरा ना हो जाए तो मैं फिर दूसरे थॉट्स लाइक करता था कि एक थॉट बड़ा आया तो 10 बार में अच्छा थॉट लॉन्ग जबरदस्ती इस चक्कर में मेरे दिमाग का दही हो जाता था पूरे दिन में यही करता रहता था अभी भी कभी एक बार करता हूं लेकिन अब पहले से काफी कम है शायद यह अहंकार का डर ही था मैं जानता सब था कि ऐसा कुछ नहीं होता है यह तो बिल्कुल तर्कहीन बात है लेकिन मैं तब भी इसको मन करता था यह कॉग्निटिव डिसोनेंस ही है अब मुझे लगता है कि हमारा मन तो जैसे हम होते हैं अहंकार जैसा होता है डरा हुआ मन में वैसे ही ख्याल आते हैं डर के फैलियर की आवश्यकता है फैलियर का है ना और हम जिससे अपनी इमेज को एसोसिएट करते हैं फिर हम उसको बचा कर रखना चाहते हैं तो यह दर वहीं से आया है अब मुझे देखा है तो थोड़ी सी पकड़ ढीली पड़ी है लेकिन अभी संघर्ष जा रही है यह सच नहीं है मुझे पता है लेकिन मैं तब भी फस जाता हूं इसमें यह कॉग्निटिव डिसोनेंस ही है



















