Shivamअब तो थोड़ी सी काम हो गई है पर पूरी तरीके से नहीं पहले मेरे अंदर एक आदत थी मुझे लगता था कि अगर मैं कोई भी दहलीज पर करूंगा तो उसे टाइम प…
शिवम जी, आपने खुद लिखा है, एक बुरा थॉट आया तो दस बार अच्छा थॉट दोहराना पड़ता था, दिन भर यही चक्कर। ज़रा देखिए इस दस के अनुपात को। यह सिर्फ डर नहीं है, यह एक हिसाब है, एक बुरे विचार की भरपाई के लिए दस अच्छे विचार जमा करने का हिसाब। मन यहाँ भगवान से डील कर रहा है, सौदा कर रहा है, कि इतना चढ़ा दूं तो बुरा नहीं होगा। और जिस पल आपने कहा भगवान सुन के मेरा बुरा ना कर दे, उसी पल भगवान को भी एक ऐसे जज में बदल दिया गया जो एक विचार पर सज़ा देने बैठा है। यह डर उतना भगवान का नहीं है जितना उस छवि का है जो आपने खुद बना रखी है, अच्छे होने की, सही सोचने की, और वह छवि जब एक भटके हुए विचार से हिलती है तो पूरी मशीनरी चालू हो जाती है उसे वापस सीधा करने की। आप कहते हैं पकड़ ढीली पड़ी है, यह सच भी है। लेकिन गौर करें, अभी भी जब यह चक्कर चलता है, तो क्या आप उस विचार को सिर्फ आने देते हैं और जाने देते हैं, या अब भी गिनती चल रही होती है, अब भी दस का हिसाब बन रहा होता है भीतर कहीं। पकड़ ढीली होने का मतलब यह नहीं कि हिसाब खत्म हो गया, हो सकता है सिर्फ रकम छोटी हो गई हो।


















