
मैं भी सत्रह साल सेना में रहा, मुझे भी ऐसे कईं अवसर आए थे कि मैं तमिल, तेलुगु, मलयालम, भोजपुरी, नेपाली, बंगाली और भी कईं भाषाएँ सीख सकता था, लेकिन अहंकार वश मैंने अपने आप को बहुत सारी सीमाओं में बांध लिया था। जिसके कारण बजाय सीखने के मैं उनका और मज़ाक उड़ाया करता था और आश्चर्य करता था। कभी उनके खाने की अलग शैली का, कभी अधिक चावल पर निर्भरता और हमारी तरह घी दूध नहीं खाने वाले, ऐसे करके उनसे अलग थलग रहता था। उनमें से कई लोग बहुत पढ़े लिखे भी थे, लेकिन फिर भी कुछ लोगों की संगति में आकर मैं भी अंधा हो चुका था। अब मुझे पछतावा होता है कि मैं उनसे कितना कुछ सीख सकता था। कईं तरह की भाषाएँ, कईं तरह के व्यंजन, कईं तरह का बहुत कुछ। लेकिन कुछ हाथ नहीं लगा ; सब अहंकार की भेंट चढ़ गया। मैंने और भी कईं धारणाएं बाँध रखी थी, कि - मुझे तो खुले में काम करना है, मैं दफ्तर में बैठकर काम नहीं कर सकता। इसलिए मैं आजतक कम्यूटर तक नहीं सीख पाया। मुझे आज भी किसी काम के लिए थोड़ा सा भी डिफिकल्ट डाक्यूमेंटेशन करना पड़ता है तो मैं पसीना पसीना हो जाता हूँ। इसके अलावा मैंने ठान रखा था कि लम्बे समय के लिए किसी के पकड़ में नहीं आना, मतलब कुछ घंटों के बाद मुझे पर्सनल टाइम मिलना चाहिए। जिसके कारण सेना में मुझे "आर्मोरर ट्रेड" मिलने वाला था, लेकिन मैंने "ड्राइवर ट्रेड" ठीक समझा, ताकि मैं खुला घूम सकूँ। ऐसा हुआ भी ; लेकिन मैं कईं पढ़े लिखे लोगों की संगती से वंचित रह गया। यहाँ तक कि वे पढ़े लिखे लोग कई बार मेरी ओछी बातें भी सुनकर रह जाते थे, क्योंकि उनका अक्सर मुझसे काम पड़ता था। लेकिन मैं इसी में खुद को होंशियार समझता था। जबकि उसी सर्विस में रहते रहते मैंने देखा कि वे लोग सिर्फ अपना काम निकाल रहे हैं, इसलिए चुप हैं, वरना वे मुझसे ऊपर के हैं। हालांकि मौका आने पर वे भी मुझे डोमिनेट करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते थे, लेकिन वो एक अलग विषय है।



















