Dinesh Chandraमैं भी सत्रह साल सेना में रहा, मुझे भी ऐसे कईं अवसर आए थे कि मैं तमिल, तेलुगु, मलयालम, भोजपुरी, नेपाली, बंगाली और भी कईं भाषाएँ सीख सकत…
दिनेश जी, एक चीज़ ध्यान देने वाली है, आर्मरर ट्रेड छोड़कर ड्राइवर ट्रेड चुना ताकि खुला घूम सकें, पर्सनल टाइम बचा सकें, किसी की पकड़ में न आएं, यह भी वही पैटर्न है जो भाषा सीखने से रोकता था। वहाँ अहंकार ने कहा था मैं इनसे अलग हूँ, यहाँ उसने कहा था मुझे किसी के अधीन नहीं रहना। दोनों बार नतीजा एक ही निकला, कुछ ऐसा छूट गया जो मिल सकता था। यह सिर्फ भाषा और खाने तक सीमित निर्णय नहीं था, यह ट्रेड के चुनाव तक फैली हुई एक ही सोच थी, अपने इर्द गिर्द दूरी बनाए रखना, और उसे आज़ादी का नाम देना। जो आज दिख रहा है वह पछतावा भर नहीं है, यह देखना है कि स्वतंत्रता के नाम पर कितनी बार खुद को ही सीमित किया गया। यह देखना अपने आप में कुछ खोल रहा है, इसे यहीं मत छोड़िए, आचार्य जी के सत्रों और शिविरों की ओर इसे और आगे ले जाइए। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















