
✍🏻 पोस्ट 1 | 28 सितंबर '26 💭 विषय — इंडियन करंट अफेयर्स ───────────── दहेज हत्याएँ आखिर खत्म क्यों नहीं होतीं? ⚖️ गाज़ियाबाद के खोड़ा में 30 वर्षीय प्रीति सिंह और उनकी 3 वर्षीय बेटी की मौत का मामला सामने आया है। पुलिस ने प्रीति के पति, सास और ननद के खिलाफ FIR दर्ज की है। प्रीति के मायके वालों ने आरोप लगाया कि उसे दहेज के लिए परेशान किया जाता था और शादी में मिली मोटरसाइकिल के बाद कार की मांग की जा रही थी। पुलिस ने पति को पूछताछ के लिए हिरासत में लिया है। पोस्टमार्टम और आगे की जाँच से मौत की परिस्थितियाँ स्पष्ट होंगी। लेकिन यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। 📊 NCRB के 2023 के आँकड़े क्या बताते हैं? • 6,156 दहेज मृत्यु के मामले दर्ज हुए। • 15,489 मामले Dowry Prohibition Act के तहत दर्ज हुए। • 1,33,676 मामले पति या रिश्तेदारों द्वारा महिला के साथ क्रूरता के दर्ज हुए। • दहेज मृत्यु के मामलों में उत्तर प्रदेश में 2,122 मौतें दर्ज हुईं, जो राज्यों में सबसे अधिक थीं। ⚖️ कानून क्या कहता है? भारत में Dowry Prohibition Act, 1961 दहेज देने और लेने, दोनों को अपराध बनाता है। दहेज की माँग करना भी अपराध है। इसके अलावा, वर्तमान भारतीय न्याय संहिता की धारा 80 में दहेज मृत्यु को परिभाषित किया गया है। यदि शादी के सात साल के भीतर महिला की असामान्य परिस्थितियों में मृत्यु हो और उससे ठीक पहले दहेज के लिए पति या उसके रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता या उत्पीड़न साबित हो, तो यह dowry death के दायरे में आता है। इसकी सजा कम-से-कम 7 वर्ष से लेकर आजीवन कारावास तक हो सकती है। वहीं BNS की धारा 85 और 86 पति या उसके रिश्तेदार द्वारा महिला के साथ क्रूरता और दहेज की अवैध माँग के लिए उत्पीड़न को भी दंडनीय बनाती हैं। 💰 यहाँ एक कानूनी अंतर भी है। हर शादी में दिया गया उपहार अपने-आप दहेज नहीं माना जाता। कानून बिना माँग के दिए गए कुछ customary presents की अनुमति देता है, लेकिन उनके विवरण की सूची बनाए रखने जैसी शर्तें हैं। वहीं दहेज देने या लेने का समझौता कानूनन प्रतिबंधित है। फिर सवाल है: जब कानून 1961 से दहेज को अपराध मानता है, तो 2023 में भी 6,156 दहेज मृत्यु के मामले क्यों दर्ज हुए? शायद समस्या केवल कानून की मौजूदगी की नहीं है। 💭 दहेज तब संभव होता है जब विवाह को दो व्यक्तियों के संबंध से ज्यादा लेन-देन की व्यवस्था बना दिया जाता है। “लड़का कितना कमाता है?” “कितनी गाड़ी मिलेगी?” “कितना सामान आएगा?” “हमने अपने बेटे को पढ़ाया है, बदले में क्या मिलेगा?” यहाँ व्यक्ति पीछे चला जाता है और उसकी आर्थिक कीमत आगे आ जाती है। ⚠️ दहेज से जुड़ी हिंसा को केवल एक कानूनी अपराध मानकर रुक जाना पर्याप्त नहीं है। कानून जरूरी है, लेकिन कानून उस सोच को अपने आप नहीं बदल सकता जिसमें विवाह से पहले ही यह हिसाब लगाया जाता है कि “मुझे इससे क्या मिलेगा?” जब यही स्वार्थ रिश्ते की बुनियाद में हो, तो शोषण और हिंसा की संभावना भी बनी रहती है। 🎓 केवल पढ़-लिख जाना भी इस समस्या का समाधान नहीं है। अगर अच्छी शिक्षा और अच्छी नौकरी के बाद भी कोई व्यक्ति अपनी योग्यता को अधिक दहेज माँगने का आधार बनाता है, तो सवाल उठता है कि शिक्षा ने उसकी दृष्टि में वास्तव में क्या बदला? 🌱 इसलिए दहेज के खिलाफ बदलाव केवल कानून बनाने से नहीं, विवाह और दूसरे व्यक्ति को देखने की दृष्टि बदलने से भी जुड़ा है। जहाँ साथी को किसी लाभ या सामाजिक प्रतिष्ठा के साधन की तरह नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र व्यक्ति की तरह देखा जाता है, वहाँ विवाह को सौदा बनाने का आधार ही कमजोर पड़ जाता है। लेकिन क्या केवल कानून उस प्रवृत्ति को बदल सकता है, जिसमें विवाह को ही सौदा समझा जा रहा है? यहाँ आंतरिक स्पष्टता ही मूल समाधान है। ❓ दहेज खत्म करने के लिए कानून बदलना पर्याप्त है, या विवाह और संबंधों को देखने की पूरी नज़र ही बदलनी होगी? स्रोत: https://timesofindia.indiatimes.com/city/noida/dowry-case-against-husband-in-laws-after-woman-3-year-old-daughter-found-dead-in-khoda-home/articleshow/134509540.cms https://www.indiacode.nic.in/indiacode/handle/123456789/1679 https://www.indiacode.nic.in/bitstream/123456789/20062/1/a2023-45.pdf















































