
दहेज प्रथा से पीड़ित और मृतकों की जितनी आंकड़ा इस लेख में दिए गए है, वो सिर्फ आंकड़ा उनके घरवालों द्वारा दर्ज कराए गए है वो है लेकिन अभी बहुत ज्यादा पीड़ितों द्वारा तो अभी दर्ज भी नहीं कराया गया होगा डर से कि कही दूसरी लड़की की शादी न हो। हमारे बिहार और पूर्वी उत्तरप्रदेश में तो बिना दहेज की एक भी विवाह संभव ही नहीं है क्योंकि न दहेज देने वाले को या बुरा लगता है नहीं लेने वाले को। और इस दहेज प्रथा के पीछे बहुत कारण है– 1. गरीबी भी कारण है क्योंकि माता–पिता खुद शिक्षित नहीं होते और अपने हवस के कारण कारण बचे ज्यादा पैदा करते है और इससे एक और कारण जुड़ा है। वो है पुरुष प्रधान समाज जिसमें अगर 2– 3 या उससे अधिक लड़की जन्म ले चुकी है लेकिन जब तक पुत्र जन्म नहीं होता तब तक और बचे पैदा करते रहते है। जिसके कारण कई बच्चे हो जाते है और गरीबी के कारण उनका न सही से पालन–पोषण हो पाता है और नहीं उसे शिक्षा दी जाती है। और बच्चों को बारे होने पर उनके खर्चे भी बढ़ते है और उन खर्चों को कम करने के लिए लड़की को 14–15 साल के उम्र ही विवाह कर दिए जाते है। और ऐसा सर्कल दोहराता जाता है। और ऐसा होते हुए मैने अपने आंखों से इसी वर्ष देखे है ऐसा क्यों हो रहा है, जानने की कोशिश की तो यही पता चला। 2. दहेज अपने आप में एक बहुत बड़ी कारण है हमारे समाज का क्योंकि गरीबी पहले से है और कई बच्चों को पैदा कर चुके है और जल्दी शादी करके उसे हटाना चाहता है भीड़ दूसरा तैयार है और बिना दहेज के उसकी शादी नहीं होगी। शुरुआती शिक्षा भी नहीं दी गई है। ताकि उसी आगे पढ़ाया भी जाए और इसलिए उसके लिए दहेज भी जुटाना ताकि जल्दी शादी करके हटाया जाए। ये ऐसा दलदल है जिससे जितना निकले कि कोशिश करो और उसी में फसता जाता है। कानून सिर्फ पन्नों पर है लेकिन आज के शिक्षक भी सिर्फ यहीं बताते है कि दहेज प्रथा गलत है लेकिन वो खुद और दहेज ज्यादा ले सके इसलिए शिक्षक बना है। बिहार में ये सब ऐसा लगता है जैसे इतनी नॉर्मल बात है। मैं सही से लिख नहीं पा रहा हूं किस हद तक हमारे समाज में ये सब चल रहा है।


















