
कई दिनों से मन में था कि गोवा में चल रहे सेशंस में पहुँचूँ। छुट्टी के लिए यूनिट में काफी समय से बात कर रहा था, लेकिन छुट्टी मिल नहीं पा रही थी। आखिरकार ज़रूरी काम बताकर, जैसे-तैसे छुट्टी sanction कराई और जम्मू से दिल्ली पहुँचा। वहाँ से सीधे गोवा के लिए निकल पड़ा। 26 तारीख की सुबह लगभग साढ़े आठ बजे मड़गाँव स्टेशन पहुँचा। स्टेशन से बाहर निकलते ही मन में सेशन तक पहुँचने की जल्दी थी। इसी भाग-दौड़ और विचारों की उथल-पुथल में ट्रेन में अपना कुछ सामान ही भूल आया। फिर वापस दौड़कर गया, सामान लिया और दोबारा स्टेशन से बाहर आया। उस पूरे समय अपने मन को भी देख रहा था, कैसे एक विचार से दूसरे विचार पर भाग रहा है। शरीर एक जगह था, लेकिन मन लगातार आगे निकलने की कोशिश कर रहा था। पहले लगा कि जिस जगह सेशन हो रहा है, वह स्टेशन से थोड़ी ही दूर होगी। लेकिन पता चला कि अभी लगभग 35–36 किलोमीटर और जाना है। लगभग एक घंटे का रास्ता था। अब लगा कि चलो, रास्ते में ही देखते हैं क्या होता है। टैक्सी ली और निकल पड़ा। और यहीं से यात्रा का एक दूसरा ही रूप सामने आने लगा। पहली बार गोवा को देख रहा था। रास्ते में हरियाली, पानी, mangroves और प्रकृति के इतने अलग-अलग रूप दिखाई दे रहे थे कि कुछ देर के लिए सेशन तक पहुँचने की जल्दी भी पीछे छूट गई। जिस जगह पहुँचने के लिए मन इतनी बेचैनी से भाग रहा था, उसी रास्ते ने मुझे रोककर प्रकृति को देखने पर मजबूर कर दिया। अंदर एक अलग तरह की खुशी उठ रही थी। ऐसा लगा कि प्रकृति केवल बाहर देखने की चीज नहीं है; वह मनुष्य को अपने भीतर देखने के लिए भी प्रेरित कर सकती है। उसी समय कबीर साहब की पंक्तियाँ याद आ गईं “कबीर बादल प्रेम का, हम परि बरष्या आइ। अंतरि भीगी आत्माँ, हरी भई बनराइ॥” #HIDP #APlive


























