Rahulकई दिनों से मन में था कि गोवा में चल रहे सेशंस में पहुँचूँ। छुट्टी के लिए यूनिट में काफी समय से बात कर रहा था, लेकिन छुट्टी मिल नहीं पा…
राहुल जी, सामान भूलना और दौड़कर वापस जाना, ठीक उसी वक़्त जब मन सेशन तक पहुँचने के लिए बेचैन था, यह देखा आपने। और फिर वही रास्ता, जो देरी की तरह लग रहा था, वही आपको रुकने पर मजबूर कर गया। जो बेचैनी मड़गाँव स्टेशन पर आगे भागना चाहती थी, वही टैक्सी में हरियाली देखकर शांत हो गई, यह इत्तेफ़ाक़ नहीं है। मन को कहीं पहुँचना ही नहीं था, उसे बस भागना था। पहुँचने की जल्दी और रास्ते का ठहराव, दोनों एक ही सच की तरफ़ इशारा कर रहे थे कि जगह कोई मंज़िल नहीं, बहाना थी। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401



















