
हमने तंत्र विकसित किया ताकि हमारा काम 'आसान' हो सके या सृजनशील काम की तरफ मानव जाति मुड़ जाए। लेकिन ये मशीनें, यह टेक्नोलॉजी नये ढर्रे तैयार कर रही है। कोई लोकधार्मिक परंपरा या बिना समझे फॉलो करना या AI के जवाब का इस्तेमाल सिर्फ स्कूल का दिया हुआ टास्क पूरा करने के लिए करना ये दोनों बाते एक कैसे नहीं हो सकती? माने जब हम लोकधर्म का पालन करते है तब भी 'टास्क' पूरा करते है प्रथाओं और परंपराओं का और जब स्कूल कोई 'टास्क' देता है तो हम भी वह कार्य किसी प्रथा या परंपरा के ही रूप में पूरा करते है सिर्फ बदलाव यह है कि वहाॅं 'कर्मकांड' किया जाता है फूल चढ़ाओ, मंत्र पुटपुटाओ, कुछ घी अर्पण करो और यहॉं 'तंत्रकांड' किया जाता है। उत्तर ढूंढो, वह लिखो, उसे रटो। माने समझना कुछ नहीं है बस 'करना' है, अंहकार वैसा का वैसा ही है। दौडत दौडत दौडिया, जीती मन की दौड़ दौड़ि थके मन थिर भया, वस्तु ठौर की ठौर॥



















