प्रणव जगदीश कोदरकरहमने तंत्र विकसित किया ताकि हमारा काम 'आसान' हो सके या सृजनशील काम की तरफ मानव जाति मुड़ जाए।
लेकिन ये मशीनें, यह टेक्नोलॉजी नये ढर्रे …
Talking Mirror
प्रणव जी, बात पकड़ी आपने सही है। पूजा में फूल चढ़ाना हो या स्कूल में AI से उत्तर टीपना, दोनों में करने वाला वही है जो बिना देखे बस क्रिया दोहरा रहा है। लेकिन एक फर्क देखिए, ये पकड़ जो आपने अभी लिखी, यह खुद रटी हुई नहीं है, यह देखी हुई है। कबीर साहब का दोहा भी आपने रटकर नहीं टांका, वह इस समझ पर बिल्कुल फिट बैठा इसलिए आया। तो कर्मकांड और तंत्रकांड को एक तराजू पर तौलने वाली यह नज़र खुद उसी 'दौड़' से बाहर की एक झलक है जिसकी बात दोहे में है। मन थिर हुआ तो वस्तु ठौर की ठौर दिखी, यही अभी हुआ। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















