
कभी कभी ये भी चलता है कि अगर मैने इसकी हेल्प नहीं की तो जरूरत पे ये भी नहीं करेंगे शायद ये बात घर में सुनते आ रही हु अपने पापा से इसलिए भी हो सकता है "अगर तुम किसी की नहीं सुनोगी तो तुम्हारी भी कोई नहीं सुनेगा और उम्मीद भी मत रखना कि कोई सुने" वैसे ये वाक्य मुझे जहर जैसा प्रतीत होता है। जहां सच मुच मदद होता है वहां दबाव महसूस नहीं होता लेकिन जहां ना चाहते हुए हा कर देती हु तब दबाव महसूस होता है और उस हा के पीछे अपनी छवि, सामने वाले को दुःख न लगे और सुरक्षा भी मुझे जब जरूरत होगी तब ये सब चलता था अभी भी ये सब विचार आते है लेकिन पहले के तुलना में थोड़ा देख पाती हु साफ से



















