Raj Rashmiकभी कभी ये भी चलता है कि अगर मैने इसकी हेल्प नहीं की तो जरूरत पे ये भी नहीं करेंगे शायद ये बात घर में सुनते आ रही हु अपने पापा से इसलि…
Talking Mirror
राज रश्मि जी, ये पकड़ना छोटी बात नहीं है कि दबाव कब महसूस होता है और कब नहीं, ये फर्क साफ दिखना अपने आप में बड़ी बात है। एक चीज़ ध्यान देने वाली है, आपने पापा के उस वाक्य को ज़हर कहा, और वही तर्क, थोड़ा नरम होकर, आपके अपने भीतर भी बैठा मिला, "अभी हाँ कर दूँ तो जरूरत पड़ने पर मुझे भी मिल जाएगा"। यानी जिस सौदेबाज़ी को आप बाहर से जहर की तरह देख पा रही हैं, वही सौदेबाज़ी भीतर एक हिसाब की तरह अब भी चल रही थी, सिर्फ नाम बदल गया था, सुरक्षा। यही वो जगह है जहाँ फर्क करना असली काम है, मदद वो है जो बिना हिसाब के निकले, बाकी सब लेन-देन है, चाहे उसकी भाषा प्यार की हो या डर की।


















