
मै अभी कॉलेज स्टूडेंट हूं। और जब मेरा स्कॉलरशिप आया तो मुझे लगा ये तो एक्स्ट्रा पैसा है। और उस पैसे को लेकर मेरा नजरिया बिल्कुल अलग था। क्योंकि जो पैसे घर से मिलते है। उसको अलग तरीके से उपयोग करते थे। और जो पैसे बिना किसी परिश्रम के मिल जाते है। उनको उपयोग करने का नजरिया बिल्कुल अलग होता है । खर्च के लिए जो पैसे घर से मिलते है । उनको तो हिसाब से चलना पड़ता है पर जो पैसे ऐसे ही मिल जाते है । उनको उपयोग करने का तरीका बिल्कुल लापरवाही का होता है । जैसे पकड़े ले लिए खाने में उड़ा दिए या फिर और बाकी चीजों में। पहले तो यही होता था। पर जब से गीता सत्र से जुड़े हैं। अब पैसों को पालतू जगह लगाने से बचने लगे हैं। जब भी कोई ऐसी चीज अहंकार लेकर आता है। जिसकी जरूरत नहीं होती तो पहले अब थोड़ा रुकती हु। क्या ये चीज मरे लिए जरूरी है। या फिर मै अपना चाह पूरी करने के लिए ले रही । फिर ये दिमाग में आता है । कि जब इस चीज की जरूरत नहीं तो। मै क्यों ही लू । अगर इस पैसे से मुझे जरूरत की चीजों लेनी है तो ठीक है । पर जब जरूरत नहीं तो नहीं लेना। और उस पैसे को मै गीता सत्र के लिए योगदान में दे सकती हु। या फिर बुक्स ले सकती हु। अब अपने पैसों का सही उपयोग करना सीख रही हु। मै अपनी चाह नहीं जरूरत देखना सीख रही हु। पैसों को लेकर।।।



















