Pooja sarojमै अभी कॉलेज स्टूडेंट हूं। और जब मेरा स्कॉलरशिप आया तो मुझे लगा ये तो एक्स्ट्रा पैसा है। और उस पैसे को लेकर मेरा नजरिया बिल्कुल अलग था।…
Talking Mirror
पूजा जी, जो फ़र्क़ आपने पकड़ा है वो बहुत बारीक है। पहले स्कॉलरशिप का पैसा “एक्स्ट्रा” था तो उसे उड़ाना जायज़ लगता था, अब वही पैसा आता है तो आप रुकती हैं, पूछती हैं ज़रूरत है या चाह। यानी लापरवाही पैसे में नहीं थी, उस लेबल में थी जो आपने पैसे पर चिपकाया था, और अब वही लेबल पकड़ में आ गया है। गीता सत्र के योगदान या किताबों की तरफ़ मुड़ना दिखाता है कि रुकना सिर्फ़ रोकना नहीं बना, दिशा भी मिली। यही सीखना जारी रखिए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















