
ऐसी तो बहुत सारी फिल्में हैं जिससे मैंने खुद को जुड़ा हुआ महसूस किया। जैसे दंगल, नायक , इमरजेंसी आदि बहुत सारी फिल्में हैं। शादी से पहले मैं अपने घर में फिल्में सीरियल आदि में में ज्यादा उलझी रहती थीं। सीरियल के किरदारों के बारे मे ही सोचती रहती थी। जब मैं 10th में पढ़ती थीं तब मुझे एक सीरियल बहुत पसंद था "दीया और बाती हम" उसमें जो लीड किरदार हैं संध्या का। उसने मुझे बहुत प्रभावित किया। उसका पुलिस बनने का सपना होता हैं। लेकिन परिस्थितियां कुछ ऐसी होती हैं कि उसके मां बाप की एक्सीडेंट में मौत हो जाती हैं और फिर उसका भाई उसकी शादी एक कम पढ़े लिखे लड़के से करवा देता हैं। शादी के बाद उसकी जिंदगी बदल जाती हैं उसको बहुत संघर्ष करना पड़ता हैं। वो एक आदर्श बहु बनने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देती हैं। किसी तरह उसके पति को उसके सपने के बारे में पता चलता है तो वो अपने परिवार से लड़ झगड़कर भी उसके सपने को पूरा करने में लग जाता हैं। आखि़र में परिवार भी उसकी काबिलियत को समझते है और उसकी पुलिस बनने की ट्रैनिंग में उसे भेजा जाता हैं वहां उसका पति और सास उसे छोड़ने जाते है। और फिर वो एक बहुत बड़ी पुलिस अफसर बनती हैं। उस सीरियल को देखकर मुझे भी लगता था कि मेरा भी पुलिस बनने का सपना है और मैं भी उसे एक दिन पूरा कर लूंगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं होता हैं वो सिर्फ एक नाटक है जिसका रियल लाइफ से कोई लेना देना नहीं होता हैं। रियल लाइफ अलग होती हैं। कोई किसी के सपने पूरे नहीं कर सकता। लेकिन उस वक्त छोटे और नासमझ थी तो अपने ख्यालों की दुनियां में ज्यादा रहते थी। आज मैं उस सीरियल के किरदारों के बारे में सोच रही थीं तो उसमें मुझे बहुत कमियां दिखाई देती हैं जो उस वक्त दिखाई नहीं देती थी। उसमें वो लड़की पूरी तरह दूसरे पर डिपेंड रहती हैं। जबकि उसमें बहुत काबिलियत होती हैं। पुलिस अफसर बनाने में उसका पति ही संघर्ष करता हैं। उसका ज्यादा ध्यान अपनी सास को खुश करने में ही रहता हैं। जो कि उससे कभी खुश नहीं रहती। खैर मैं अब कोई भी सीरियल और फिल्में नहीं देखती। ना ही अब मुझे पसंद है। अपनी जिंदगी किसी सीरियल से कम तो नहीं उसे ही देख लेती हूं सौ बुराइयां उसमें ही मिल जाती हैं। उसे ही ठीक करने में लग जाती हूं।



















