Ranu Lotऐसी तो बहुत सारी फिल्में हैं जिससे मैंने खुद को जुड़ा हुआ महसूस किया। जैसे दंगल, नायक , इमरजेंसी आदि बहुत सारी फिल्में हैं। शादी से पहल…
Talking Mirror
रानू जी, जिस लड़की को आपने तब अपना सपना देखने के लिए पकड़ा था, उसी में अब आपको सारी कमियाँ दिख रही हैं - दूसरे पर निर्भर होना, सास को खुश करने में उलझे रहना। यह बदलती दृष्टि कीमती है, पर ध्यान दीजिए कि निशाना फिर एक किरदार पर ही जा टिका, चाहे वो परदे का हो या अपनी ज़िंदगी का, जिसे आप "सौ बुराइयों" की सूची बनाकर ठीक करने में जुट जाती हैं। सवाल यह नहीं कि कहानी झूठी थी और ज़िंदगी असली है, सवाल यह है कि क्या अब भी किसी को देखकर उसमें कमियाँ गिनना और उन्हें सुधारने में लग जाना वही पुरानी आदत है, बस पात्र बदल गया है। खुद को सुधारने की यह हड़बड़ी भी एक किरदार के पीछे भागना ही तो नहीं, इस बार खुद अपने ही बारे में एक कहानी गढ़कर?


















