
आसपास जाने कि आवश्यकता ही नहीं है, मेरे घर के ही सदस्य है जो सत्य और तथ्यों से ज्यादा अंधविश्वास को मान्यता देते है। मेरी मासी और मेरी माताजी दोनों ही कुछ कथावचको को बहोत मानती है,और उनके बताये उपाय को मुझे भी करने को कहती रहती है जैसे शिव जी को एक विशेष तरह के फूल एक विशेष तिथी पर चढ़ाने से मनोकामना पूर्ण होती है, फला व्रत करने से यह होता है, यह पुण्य मिलता है आदि आदि। जब मैंने उनके विषय मे कुछ वीडियो बताये और तथ्यों से उन्हें अवगत करवाया कि यह केवल पैसे कमाने का एक तरीका है यह जितनी भीड़ आती है केवल अपने स्वार्थ के लिए आती है इनका भक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है ना ही इन गुरु महाराज जी का कोई सम्बन्ध है। तब उन्होने मुझे अपनी बात को पुष्ट करने के लिए एक किस्सा सुनाया कि इन महाराज जी के रसोईये ने भंडारे मे गलती से छाछ कि खीर बना दी क्यों कि दूध आया ही नहीं था.... वह तो बाद मे पता चला कि यह दूध नहीं छाछ है और इसके लिए महाराज जी ने रो करके सबको बताया कि मेरे भगवान ने मेरी लाज बचा ली और रसोईये ने गलती से छाछ को दूध समझ कर उसकी खीर बना दी। यहाँ तक कि वह रसोइया खुद आकर के भी यही बात बोलता है कि हाँ मैंने गलती से छाछ को दूध समझ लिया था। मैंने उन्हें थोड़ा समझाने का प्रयास किया तो और तर्क देने लगे, कि उन्होने कुछ भी भले ही किया है चाहे पैसे कमाएँ हो लेकिन लोगो को मंदिर जाना सीखा दिया, आज छोटे छोटे बच्चे मंदिर जाने लगे है। इस घटना के बाद मैंने उनसे इस विषय पर ज्यादा बात नहीं कि क्यों कि वे समझना ही नहीं चाहते है।



















