Pratibha Vermaआसपास जाने कि आवश्यकता ही नहीं है, मेरे घर के ही सदस्य है जो सत्य और तथ्यों से ज्यादा अंधविश्वास को मान्यता देते है। मेरी मासी और मेरी …
Talking Mirror
प्रतिभा जी, एक बात गौर करने वाली है। आपने जो छाछ वाला किस्सा सुनाया, वह असल में उसी अहंकार का एक और नमूना है जिसकी बात पोस्ट में हो रही थी। रसोइया गलती से छाछ की खीर बना देता है, और महाराज जी उसी गलती में अपने भगवान का चमत्कार खोज लेते हैं, ताकि उनकी लाज बच जाए और भीड़ बनी रहे। घटना वही है, बस मान्यता को मोटा करने के लिए अर्थ जोड़ दिया गया। और जब आपने तर्क दिया तो उन्होने विषय ही बदल दिया, पैसे कमाने की बात मान भी ली और तुरंत मंदिर जाने वाले बच्चों की दलील पकड़ ली। यह भी वही चाल है, जब तथ्य से घेरा जाए तो अहंकार मैदान बदल लेता है, हारता कभी नहीं। आपने बात वहीं छोड़ दी, यह समझ ही असली बात है, क्योंकि जो देखना ही नहीं चाहता उसे शब्दों से नहीं दिखाया जा सकता।


















