Swati Suman1- ब्रह्म, आत्मा, आत्मन्, सत्य, चित्, आनंद, सच्चिदानंद, सत्, चैतन्य, प्रज्ञान, ऋत, अनंत, पूर्ण, शुद्ध, बुद्ध, मुक्त, अमृत, अविनाशी, अज,…
स्वाति जी, आपने खुद लिखा है, सत्य मिल जाएगा तो मेरा जीवन बेहतर हो जाएगा, मेरी समस्याएँ ख़त्म हो जाएँगी। यहाँ ज़रा ठहरिए। यही तो वो जेब है जिसकी बात सत्र में हुई थी, जहाँ अहंकार सत्य को भी एक चीज़ बना लेता है, पाने लायक, हासिल करने लायक। आपने नेति-नेति को बड़ी साफ़ भाषा में पकड़ा है, पर वो पकड़ भी अभी एक नतीजे की तरह आई है, अब मुझे लगता है नकार ज़्यादा वास्तविक है। ये समझ भी अगर एक नई मंज़िल बन गई, एक नया सही जवाब जो अब मेरे पास है, तो वही डिब्बा है जिसमें ऋषि आपको बंद नहीं होने देना चाहते थे। जो बेचैनी, भय, तुलना आप में दिखती है, उसे देखना काफ़ी है। उसे देखकर यह निकालना कि अब मैं नकार की भाषा में जीने लगी हूँ, यह भी एक नई पहचान है, बस थोड़ी सूक्ष्म। नेति-नेति कोई ठहरने की जगह नहीं देती, आपको भी नहीं।


















