
बंधन और स्वतंत्रता🪔 आज आचार्य जी की बात सुनकर एक सवाल भीतर ठहर गया मैं जिस आज़ादी की बात करती हूँ, क्या अपने पास के बंधनों को भी देखती हूँ? दूर की बेड़ियाँ तो दिख जाती हैं, पर जो मन ने स्वयं पहन रखी हैं, उनका क्या? कभी इच्छा बनकर, कभी डर बनकर, कभी अहंकार बनकर, कभी “मैं मजबूर हूँ” बनकर ये बंधन मेरे भीतर ही पलते हैं। मर्कट की मुट्ठी की तरह मैं भी बहुत कुछ पकड़े रहती हूँ, फिर उसी पकड़ को देखकर कहती हूँ “मैं बंधी हुई हूँ।” दूसरे ने दुख दिया यह कहना आसान है, पर एक बार ठहरकर पूछना कठिन दूसरा जैसा भी है, मैं स्वयं को कब देखूँगी? हाथी नदी में नहाकर फिर अपने ऊपर धूल डाल देता है, बंधन दिखती रही, कस्तूरी मृग की तरह, सुख और सत्य को बाहर खोजती रही, मछली की तरह, पानी में रहकर भी पानी को तरसती रही। स्वतंत्रता कहीं बाहर नहीं, बस अपनी पकड़ को देखना है। जो असत्य है, उसे हटाते जाना है, क्योंकि सत्य को बनाना नहीं पड़ता। स्वतंत्रता का अर्थ बंधनों से भाग जाना नहीं, बल्कि यह देख लेना है कि जिसे मैं बंधन कह रही हूँ, उसे पकड़े कौन बैठा है? और जब पकड़ने वाला ही अपनी पकड़ को देख लेता है, तो धीरे-धीरे बंधन भी मिटने लगता है। साफ़ करने वाला ही साफ़ हो गया बस यही सत्य है।🪔






















