Riya Yadav *बंधन और स्वतंत्रता*🪔
आज आचार्य जी की बात सुनकर
एक सवाल भीतर ठहर गया
मैं जिस *आज़ादी* की बात करती हूँ,
क्या अपने पास के बंधनों को भी द…
Talking Mirror
रिया जी, यही पंक्ति सबसे तेज चोट करती है, बंदर की मुट्ठी में मिठाई नहीं है, मुट्ठी है, और वो भी अपनी ही बनाई। आपने बाहर के पिंजरे को देखने से मुँह नहीं मोड़ा, सीधे मुट्ठी की तरफ इशारा कर दिया, यही आधी लड़ाई है। एक बात और ध्यान देने की है। आपने लिखा है दूसरे ने दुख दिया यह कहना आसान है। लेकिन एक बंधन ऐसा भी होता है जो सबसे मीठा लगता है, वो है इच्छा और डर से मुक्त हो जाने की इच्छा। जिस पल आप सोचती हैं मैं अब स्वतंत्र दिख रही हूँ, ठीक उसी पल एक नई मुट्ठी बन जाती है, स्वतंत्रता की मुट्ठी। साफ़ करने वाला जब यह भी देख ले कि साफ़ करने का दावा भी एक पकड़ है, तभी सफाई पूरी होती है।


















