
✍🏻 पोस्ट 21 | 17 सितंबर'26 💭 विषय — इतिहास ───────── 💭 दारा शिकोह: उपनिषदों को पश्चिम तक पहुँचाने वाला पुल 📜 जर्मन दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर उपनिषदों से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने उन्हें अपने जीवन का सांत्वना-स्रोत कहा। लेकिन सवाल यह है कि भारत के प्राचीन उपनिषद यूरोप तक पहुँचे कैसे? 🔍 इस यात्रा में एक महत्वपूर्ण नाम सामने आता है, दारा शिकोह का। 👑 दारा शिकोह मुगल बादशाह शाहजहाँ के बड़े पुत्र थे। वे केवल राजकुमार नहीं थे, बल्कि भारतीय वेदांत और सूफी विचारधारा को समझने वाले गंभीर अध्येता भी थे। उन्हें संस्कृत उपनिषदों में इतनी रुचि हुई कि उन्होंने बनारस के विद्वानों की सहायता से लगभग 50 उपनिषदों का फ़ारसी में अनुवाद करवाया। 📖 वर्ष 1657 में यह कार्य ‘सिर्र-ए-अकबर’, यानी ‘महान रहस्य’, के नाम से पूरा हुआ। 🧭 उस समय संस्कृत का ज्ञान भारत के बाहर बहुत सीमित था। फ़ारसी उस दौर में ज्ञान और प्रशासन की प्रमुख भाषाओं में से एक थी। इसलिए दारा का यह प्रयास केवल अनुवाद नहीं था, बल्कि दो अलग बौद्धिक परंपराओं के बीच एक पुल बनाना था। 🌍 लगभग एक सदी बाद, 1775 में फ्रांसीसी विद्वान अब्राहम हायसिंथ अनकेतिल-दुपरों को दारा के फ़ारसी अनुवाद की एक पांडुलिपि मिली। उन्होंने फ़ारसी से इसका लैटिन अनुवाद किया, जो 1801-02 में ‘Oupnek’hat’ नाम से प्रकाशित हुआ। 🔗 अब ज्ञान की यात्रा कुछ ऐसी बन गई: संस्कृत उपनिषद → फ़ारसी ‘सिर्र-ए-अकबर’ → लैटिन ‘Oupnek’hat’ → यूरोपीय दर्शन 💡 इसी लैटिन अनुवाद के माध्यम से शोपेनहावर जैसे यूरोपीय दार्शनिक उपनिषदों तक पहुँचे। इस तरह दारा शिकोह का बौद्धिक प्रयास भारत के वेदांत दर्शन को यूरोप के विचार-जगत तक पहुँचाने वाली महत्वपूर्ण कड़ी बना। 🤝 दारा शिकोह ने उपनिषदों को अपनी धार्मिक पहचान की श्रेष्ठता सिद्ध करने के लिए नहीं पढ़ा था। वे उन्हें समझना चाहते थे। उन्होंने ज्ञान को अपनी पहचान की चारदीवारी में बंद करने के बजाय दूसरी परंपरा की ओर जाने का साहस किया। 🪞 यहीं यह इतिहास केवल इतिहास नहीं रह जाता। ⚠️ अहंकार ज्ञान को भी अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाहता है। वह किसी विचार को इसलिए नहीं सुनता कि उससे कुछ जाना जा सके, बल्कि इसलिए सुनता है कि अपनी पुरानी मान्यता को और मजबूत किया जा सके। 🌱 दारा शिकोह का रास्ता इससे अलग था। उनके सामने दूसरी परंपरा थी, लेकिन उन्होंने उसे खतरे की तरह नहीं, समझने योग्य संभावना की तरह देखा। 👁️ और जब मैं किसी दूसरी परंपरा, विचार या व्यक्ति की बात सुनता हूँ, तो मुझे देखना होगा कि मैं वास्तव में जानना चाहता हूँ या केवल अपनी पुरानी मान्यता की पुष्टि खोज रहा हूँ। ❓ सवाल केवल इतना नहीं कि मैं कितना ज्ञान रखता हूँ। सवाल यह भी है कि मेरी नीयत ज्ञान के सामने खुलने की है, या उसे अपनी पहचान का उपकरण बना लेने की? स्रोत https://www.iranicaonline.org/articles/dara-sokoh/












































