
मित्रों, एक छोटा सा सवाल है जिस पर आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ। बाहर ठेले पर वही पॉपकॉर्न हमें ₹10 में मिल जाता है, लेकिन सिनेमा हॉल में जाते ही वही ₹100-200 का हो जाता है। असल बात कीमत की नहीं, बल्कि समय, परिस्थिति और माहौल की है जो दाम तय करती है। जब हम लोगों को लाइन में लगकर महंगे दाम पर खरीदते देखते हैं, तो हमारे मन में भी वही भीड़ में शामिल होने की इच्छा जगती है। पर यदि हम खुद को रोककर अपने आचार्य जी के पाठ पर गौर करें और अपनी चेतना से तर्क करें—कि हम भीड़ के पीछे क्यों भाग रहे हैं—तो कीमत और अपनी सोच का वास्तविक अंतर समझ आ जाता है। मैंने अपने आचार्य जी से यही सीखा है। क्या हम वाकई अपनी चेतना से सोचते हैं या सिर्फ माहौल के दबाव में? कृपया इस पर अपना मार्गदर्शन दें।



















