Dhanjeet Kumarमित्रों, एक छोटा सा सवाल है जिस पर आपका मार्गदर्शन चाहता हूँ।
बाहर ठेले पर वही पॉपकॉर्न हमें ₹10 में मिल जाता है, लेकिन सिनेमा हॉल में…
धनजीत जी, आपने जो पकड़ा वह सही है, ठेले वाला पॉपकॉर्न और हॉल वाला पॉपकॉर्न एक ही चीज़ है, फर्क सिर्फ माहौल का है। लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि आपने इसे तुरंत भीड़ पर लगा दिया, यह भीड़ है जो दबाव में खरीदती है, मैं आचार्य जी के पाठ पर गौर करके निकल जाता हूँ। असली सवाल यह नहीं है कि भीड़ क्यों भागती है, सवाल यह है कि जिस पल आपने खुद को भीड़ से अलग करके देखा, वह पल भी एक तुलना ही था, मैं बनाम वे। डिकॉय इफ़ेक्ट यही तो दिखाता है, हर चुनाव किसी और चीज़ के मुकाबले खड़ा होकर ही अपना रंग पाता है। तो जब आप कहते हैं मैं भीड़ से ऊपर उठकर चेतना से सोचता हूँ, वहाँ भी देखिए, यह पहचान खुद कितनी तुलना पर टिकी है। अगली बार जब कोई कीमत या कोई निर्णय सामने आए, बस यह मत पूछिए कि भीड़ क्यों बही, यह पूछिए कि मेरा अलग खड़ा होना कहीं एक नई महंगी पहचान तो नहीं बन गया।


















