
ऐसी बहुत सी मान्यताएं है जो बिना जांचे ढो रहे हैं। जैसे बेटी तो पराई धन होती है उसे तो दूसरे घर जाना होता है। इसपर देखने के बजाय या जांचने के बजाय बस परम्परा को ढो रहे हैं और कह रहे हैं कि यही तो नियम है इसको मानना पड़ेगा। पर हम देख नहीं पाते कि जो ये नियम कितना हद तक सही हैं या गलत बस नियम मानने चलते हैं। क्योंकि हमें लगता है ये तो शुरू से होते आ रहा है तो कैसे गलत हो सकती है। ये देखते ही नहीं जो शुरू से चलते आ रहा है जरूरी थोड़े ही की वो सही ही होगा।



















